हिमाचल प्रदेश में मौसम के साथ खानपान की परंपराएं भी बदलती हैं। भटूरू, बेदिया, पटांडे और पतरोड़े जैसे पारंपरिक व्यंजन स्वाद के साथ पीढ़ियों से चली आ रही भोजन तैयार करने की विधियों को भी दर्शाते हैं। पपरोला आयुर्वेदिक महाविद्यालय के विशेषज्ञों ने मौसमी खानपान, पाचन और पारंपरिक रसोई के संबंध का अध्ययन किया है।
पहाड़ों में मौसम के साथ खानपान भी बदल जाता है। मानसून में बारिश के साथ जहां हर तरफ हरियाली छा जाती है। वहीं घरों की रसोई में भटूरू, बेदिया, पटांडे, वार्री और पतरोड़े जैसे पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू भी बढ़ जाती है। इन व्यंजनों की खासियत केवल उनका स्वाद नहीं, बल्कि उनमें छिपा सेहत का खजाना और उन्हें तैयार करने की पीढ़ियों पुरानी विधियां भी हैं। किण्वन (फर्मेंटेशन), अनाज को भिगोने, पीसने, मसालों का संतुलित इस्तेमाल और भाप में पकाने जैसी तकनीकें हिमाचल की पारंपरिक रसोई को विशिष्ट बनाती हैं। राजकीय राजीव गांधी स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल पपरोला के विशेषज्ञों के अध्ययन में वर्षा ऋतु के आहार-विहार और हिमाचल के पारंपरिक खानपान के संबंध को समझने का प्रयास किया गया है।