फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हिमाचल: पूर्व विधायक राजेंद्र राणा, रवि ठाकुर को मिलेगी पेंशन, हाईकोर्ट ने दिया जल्द भुगतान का आदेश

Fri, 10 Apr 2026 10:36 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर की बकाया पेंशन एवं एरियर का भुगतान एक माह के भीतर करने का आदेश दिया है।  पढ़ें पूरी खबर...
विज्ञापन
डिजाइन फोटो। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर की बकाया पेंशन एवं एरियर का भुगतान एक माह के भीतर करने का आदेश दिया हैं। राज्य सरकार ने विधेयक पारित कर अयोग्य घोषित विधायकों की पेंशन बंद करने का प्रावधान किया है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि विधेयक की प्रभावशीलता को पहले से लागू नहीं किया जा सकता है। यह प्रावधान भविष्य के लिए लागू होगा। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मामले का निपटारा करते हुए विधानसभा सचिव को आदेश दिए हैं कि यदि एक महीने में भुगतान नहीं किया तो बकाया राशि पर 6 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देना होगा। भविष्य की पेंशन समय पर जारी करें। राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर ने पेंशन रोकने के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

विज्ञापन


दरअसल, राज्य सरकार ने विधानसभा (सदस्यों के भत्ते और पेंशन) संशोधन विधेयक 2024 के माध्यम से दलबदल (10वीं अनुसूची) के तहत अयोग्य घोषित सदस्यों की पेंशन रोकने का प्रावधान किया था। विधानसभा सचिव की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि सरकार ने पुराना विवादित विधेयक वापस ले लिया है। इसकी जगह नया विधेयक पारित किया है, जिसके तहत केवल 14वीं विधानसभा या उसके बाद चुने सदस्यों पर ही नियम लागू होगा। सरकार ने विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा है, जिस पर अभी सहमति मिलना बाकी है। चूंकि राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर 12वीं और 13वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं, इसलिए नया कानून उन पर लागू नहीं होता।

 

छह विधायकों ने थामा था भाजपा का दामन, दो की रुकी पेंशन
साल 2024 में कांग्रेस के छह विधायकों राजेंद्र राणा, रवि ठाकुर, सुधीर शर्मा, इंद्रदत्त लखनपाल, चैतन्य शर्मा और देवेंद्र कुमार भुट्टो पर दलबदल कानून के तहत कार्रवाई की गई थी। उन्होंने कांग्रेस विधायक रहते राज्यसभा में भाजपा प्रत्याशी हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी और भाजपा का दामन थाम लिया था। इनमें से सुधीर और लखनपाल उपचुनाव में फिर से भाजपा विधायक चुने गए। उन्हें वेतन मिलता है। चैतन्य और भुट्टो पहली बार चुने गए तो उन्हें पेंशन बाद में नहीं लगेगी। राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर की पेंशन बंद हो गई थी। वे पिछली विधानसभाओं में भी विधायक रहे हैं।
 

भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा सुक्खू सरकार पर बरसे
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सुक्खू सरकार की राजनीति 'समान दृष्टि' नहीं बल्कि 'बदले की भावना' पर आधारित है। भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही झूठ गढ़ने, विपक्ष को निशाना बनाने और विरोध करने वाले नेताओं को परेशान करने की नीति अपनाई, लेकिन अब न्यायालय के फैसले ने उनके इस एजेंडे पर सीधा प्रहार किया है। 

 

'कानून किसी व्यक्ति विशेष को टारगेट करने के लिए नहीं बनाए जाते'
भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने तीखा प्रहार करते हुए कहा यह फैसला सुक्खू सरकार के गाल पर तमाचा है। कांग्रेस ने कानून को बदले का हथियार बनाने की कोशिश की, लेकिन न्यायालय ने साफ कर दिया कि कानून किसी व्यक्ति विशेष को टारगेट करने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि भविष्य के लिए बनाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 2024 का संशोधन बिल, जिसमें अयोग्य घोषित विधायकों (10वीं अनुसूची) की पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, पूरी तरह राजनीतिक द्वेष से प्रेरित था। लेकिन सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे वह बिल वापस लेना पड़ा। इसके बाद 2026 में नया संशोधन लाया गया, जिसकी सीमा केवल 14वीं विधानसभा के बाद के विधायकों तक सीमित रखी गई—यह स्वयं साबित करता है कि पहले किया गया कदम गलत और असंवैधानिक था।


 

'यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण'
आशीष शर्मा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने दो वर्षों तक पूर्व विधायकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया। उनकी वैध पेंशन रोकी गई, उन्हें न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़े- यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची का दुरुपयोग करते हुए पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, जबकि यह प्रावधान केवल सदस्यता समाप्ति तक सीमित है, न कि पूर्व अधिकारों को समाप्त करने के लिए। कांग्रेस सरकार ने संविधान को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश की, लेकिन न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के साथ 'मनमानी' नहीं चलेगी।

 

'फैसला संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत'
आशीष शर्मा ने आगे कहा कि यह पूरा प्रकरण कांग्रेस सरकार की ध्यान भटकाने की राजनीति का उदाहरण है जहां अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए मुद्दों को भटकाया जाता है और विपक्ष को टारगेट किया जाता है। पहले दिन से ही कांग्रेस सरकार की एक ही सोच रही कि झूठ कैसे गढ़ना है, विपक्ष को कैसे दबाना है और विरोध करने वालों को कैसे परेशान करना है। लेकिन अब अदालत ने सच्चाई सामने ला दी है। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल पूर्व विधायकों की जीत नहीं, बल्कि रूल ऑफ लॉ, संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत है। अंत में भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा इस मुद्दे को प्रदेश की जनता के बीच लेकर जाएगी और बताएगी कि कैसे कांग्रेस सरकार ने कानून का दुरुपयोग कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया। यह सरकार 'बदले की भावना' से चल रही है, न कि 'समान दृष्टि' से और अब जनता भी इसका जवाब देने के लिए तैयार है। 

सत्ता बदले के लिए नहीं, बदलाव के लिए होती है : जयराम ठाकुर 
पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने व्यवस्था परिवर्तन वाली सुक्खू सरकार के कानून को असंवैधानिक बताते हुए कांग्रेस के बागी विधायकों की पेंशन की बहाली के आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि यह न्याय की जीत है और बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई और तानाशाही की हार है। सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर लगातार असंवैधानिक कार्य करती जा रही है, जिसके कारण आए दिन माननीय न्यायालय में सरकार की फजीहत होती है। 


 
आज अपने फैसले में माननीय न्यायालय द्वारा सरकार पर की गई टिप्पणी ‘कानून बदले के लिए नहीं, भविष्य के लिए होते हैं’ सरकार की हर असंवैधानिक गतिविधि पर एक तमाचा है। मुख्यमंत्री को समझना चाहिए कि सत्ता उनके अहं की संतुष्टि और राजनीतिक प्रतिशोध का साधन नहीं है।

जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रदेश की विधानसभा को मुख्यमंत्री के राजनीतिक प्रतिशोध का मंच बनने से रोकने के लिए हमने स्पीकर से गुहार भी लगाई थी। विधानसभा में यह बात हमने लगातार कही, बार-बार कही कि ऐसे कानून मत बनाओ जो कानून की कसौटी पर एक मिनट भी न टिक पाएं। इस माननीय सदन में बनाया गया कानून अगर अदालत में संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, तो इससे इस माननीय सदन की गरिमा गिरती है। इस सदन की एक गरिमा है, उसका ध्यान रखा जाए। हमने विधानसभा के भीतर भी माननीय विधानसभा अध्यक्ष को आगाह किया था कि राजनीतिक प्रतिशोध की भावना में ऐसे कानून बनाने की इजाजत न दें, जो कानून की कसौटी पर एक मिनट भी न टिक पाएं।

जयराम ठाकुर ने कहा कि एक नहीं, दर्जनों बार इस सरकार के नीतिगत फैसले माननीय उच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज किए गए हैं। हर दिन मुख्यमंत्री के असंवैधानिक कार्यों की वजह से हिमाचल प्रदेश चर्चा में होता है और पूरे प्रदेश की किरकिरी होती है। यह सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने से बाज नहीं आ रही है। सलाहकारों और वकीलों की फौज के बावजूद भी मुख्यमंत्री हर दिन असंवैधानिक फैसले क्यों लेते हैं, जिससे प्रदेश के संसाधन और सरकार की ऊर्जा न्यायालय में खर्च होती है।

सिर्फ पंचायत चुनाव में ही मुख्यमंत्री को पांच बार माननीय उच्च न्यायालय की फटकार पड़ चुकी है। व्यवस्था परिवर्तन वाली सुक्खू सरकार का शायद ही कोई नीतिगत फैसला होगा, जो कानून की कसौटी पर खरा उतर पाया हो। मुख्यमंत्री से निवेदन है कि राजनीतिक प्रतिशोध के बजाय बड़े दिल से, खुले मन से प्रदेशवासियों के हितों के लिए काम करें।
विज्ञापन

अयोग्यता के आधार पर एमएलए पेंशन रोकना असंवैधानिक : राकेश
भाजपा के मुख्य प्रवक्ता राकेश जमवाल ने 14वीं विधानसभा के दौरान अयोग्य घोषित विधायकों की पेंशन रोकने के लिए लाए गए संशोधन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे असंवैधानिक, विधि-विरुद्ध और मनमाना कदम बताया है। राकेश जमवाल ने कहा कि यह संशोधन उन विधायकों को लक्षित करता है जिन्हें शेड्यूल 2(1)(ए) के तहत अयोग्य घोषित किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में पहले से ही अयोग्यता से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी बदलता है या पार्टी लाइन के विरुद्ध जाता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन यह प्रावधान केवल सदस्यता समाप्त करने तक सीमित है, इसमें कहीं भी पेंशन रोकने या समाप्त करने की बात नहीं की गई है।

उन्होंने कहा कि अयोग्यता को पेंशन से जोड़ना पूरी तरह से कानून की गलत व्याख्या है। उन्होंने कहा कि यह कहना कि आप अयोग्य हुए हैं, इसलिए आपकी पेंशन भी रोकी जाएगी। इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है। पेंशन का विषय अयोग्यता के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता। जमवाल ने कहा कि यह संशोधन अभी तक कानूनी रूप से प्रभावी नहीं हुआ है। जब तक इस संशोधन को राज्यपाल (और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति) की स्वीकृति नहीं मिलती और इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया जाता, तब तक इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर चैतन्य शर्मा और देवेंद्र भुट्टो कोर्ट जाते हैं, तो उनकी पेंशन भी निश्चित रूप से बहाल होगी। संविधान के विपरीत कोई भी प्रावधान टिक नहीं सकता। 

 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें