राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 116 उम्मीदवार एपीएल परिवारों से हैं, जो कुल प्रत्याशियों का करीब 67.44 प्रतिशत बनते हैं। इसके विपरीत बीपीएल परिवार से केवल एक उम्मीदवार मैदान में है। इसके अलावा 38 करदाता और 17 गैर करदाता उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ते चुनावी खर्च, प्रचार और संसाधनों की आवश्यकता के कारण गरीब वर्ग के लिए चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है।
नगर निगम चुनावों में महिलाओं की भागीदारी इस बार उल्लेखनीय रही है। कुल 172 उम्मीदवारों में 96 महिलाएं और 76 पुरुष चुनाव मैदान में हैं। 50 प्रतिशत आरक्षण के कारण महिला उम्मीदवारों की संख्या पुरुषों से अधिक रही। श्रेणी वार देखें तो ओपन कैटेगरी में 94 उम्मीदवार हैं, जबकि एससी महिला वर्ग से 22, एसटी महिला वर्ग से 5 और ओबीसी महिला वर्ग से 3 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं।
शिक्षा के स्तर पर भी चुनावी तस्वीर मिश्रित दिखाई दे रही है। सबसे अधिक 46 उम्मीदवार स्नातक हैं, जो कुल प्रत्याशियों का लगभग 26.74 प्रतिशत बनते हैं। इसके अलावा 30 उम्मीदवार स्नातकोत्तर हैं। वहीं 14 प्रत्याशी ऐसे हैं, जिनकी शिक्षा 10वीं से कम है और एक उम्मीदवार अनपढ़ भी चुनाव मैदान में है।
इससे यह साफ है कि चुनाव में शिक्षित और अनुभवी चेहरों के साथ सामान्य पृष्ठभूमि के लोग भी अपनी राजनीतिक किस्मत आजमा रहे हैं। राजनीतिक दलों की बात करें तो भाजपा ने 62, कांग्रेस ने 63 और 47 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। चारों नगर निगमों में 17 मई को मतदान होगा, जबकि चुनाव परिणाम 31 मई को घोषित किए जाएंगे।
युवाओं की नगर निगम में रहेगी सीमित भागीदारी
आयु वर्ग के आंकड़ों में 41 से 50 वर्ष और 51 से 60 वर्ष के उम्मीदवारों का सबसे अधिक दबदबा है। 41 से 50 वर्ष आयु वर्ग के 67 और 51 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 53 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। इसके विपरीत 21 से 30 वर्ष के केवल 5 युवा प्रत्याशी मैदान में हैं, जिससे स्थानीय राजनीति में युवाओं की सीमित भागीदारी सामने आई है।