इसमें डायरेक्ट रिक्रूट्स को सीनियर माना गया था। इसके साथ ही पदोन्नत इंजीनियरों की याचिका (सीडब्ल्यूपी 5879/2022) को खारिज कर दिया गया। अदालत ने बिजली बोर्ड को आदेश दिया है कि इस फैसले के आधार पर 4 सप्ताह के भीतर समीक्षा प्रक्रिया पूरी की जाए। यह मामला वर्ष 2013-16 में भर्ती व पदोन्नति से जुड़ा है। बोर्ड ने वर्ष 2013 में लोक सेवा आयोग को सीधी भर्ती के लिए अधियाचन भेजा था, जिसके तहत 2015-16 में डायरेक्ट रिक्रूट्स की नियुक्ति हुई। वहीं, प्रमोटी इंजीनियरों को जनवरी 2014 में पदोन्नत किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध एनआर परमार मामले के सिद्धांतों के आधार पर बोर्ड ने 19 अगस्त 2017 को अंतिम वरिष्ठता सूची जारी की। इसमें सीधी भर्ती वाले इंजीनियरों को भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के वर्ष (2013-14) से वरिष्ठता देते हुए प्रमोटियों से ऊपर रखा गया।
प्रमोटी इंजीनियरों की आपत्तियों को बोर्ड ने 15 फरवरी 2018 को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा। अदालत ने बिजली बोर्ड की कार्यप्रणाली पर कड़ा एतराज जताया। कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य मामला हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था, उससे ठीक कुछ दिन पहले (16 दिसंबर 2021) बोर्ड ने नई वरिष्ठता सूची को अंतिम रूप दिया और 23 दिसंबर 2021 को उसी आधार पर पदोन्नतियां भी कर दीं। हाईकोर्ट ने इस जल्दबाजी को गैरकानूनी और समझ से परे बताया। पदोन्नत इंजीनियरों की ओर से केंद्र व राज्य सरकार के 2014 और 2021 के उन ऑफिस मेमोरेंडम को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत वरिष्ठता तय की गई थी। अदालत ने इन सभी ज्ञापनों को कानूनन सही ठहराते हुए चुनौती खारिज कर दी।