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हिमाचल: घटिया दवा सामग्री बेचने और जीएसटी चोरी में राज्य सरकार और फार्मा संचालकों को हाईकोर्ट का नोटिस

Mon, 07 Sep 2026 07:01 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

 प्रदेश हाईकोर्ट ने नकली दवाइयों के निर्माण, फर्जीवाड़ा और करोड़ों रुपये की जीएसटी चोरी से जुड़े जनहित के मामले में राज्य सरकार और एक फार्मा कंपनी के संचालकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नकली दवाइयों के निर्माण, फर्जीवाड़ा और करोड़ों रुपये की जीएसटी चोरी से जुड़े जनहित के मामले में राज्य सरकार और एक फार्मा कंपनी के संचालकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु की खंडपीठ ने यह आदेश अनमोल सिंह राणा की ओर से दायर जनहित याचिका पर दिया। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्तूबर को होगी। जनहित याचिका में बताया गया है कि इस पूरे खेल में 27 से 28 टन फार्मास्युटिकल सामग्री (कच्चे माल) की अवैध सप्लाई, धोखाधड़ी और बड़े पैमाने पर जीएसटी चोरी की बात सामने आई है। इसमें अवैध तरीके से कमाए गए काले धन की जांच बेहद जरूरी है।

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कंपनी के निदेशकों पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने 275 किलो नकली दवा एक्सप्लोटैब का बिक्री रिकॉर्ड छुपाया और बिना वैध लाइसेंस के भारी मात्रा में फर्जी दवाइयां बनाईं। यह ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 का सीधा उल्लंघन है। ड्रग विभाग ने जुलाई 2023 में ही इनका थोक दवा लाइसेंस रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद नालागढ़ की अदालत ने जनवरी 2024 में इन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया था। राज्य के स्टेट विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो ने 1 जुलाई 2026 को पत्र लिखकर इस मामले की जांच में अपनी लाचारी व्यक्त की थी। विजिलेंस का कहना है कि उनके पास जनशक्ति (मैनपावर), संसाधनों और राजस्व विभाग के कामकाज के डोमेन ज्ञान की कमी है, जिससे वे इतनी जटिल वित्तीय हेराफेरी की जांच नहीं कर सकते।

15 दिन पूरे होने से पहले चेक बाउंस केस, आरोपी की सजा व जुर्माना रद्द
 प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में स्पष्ट किया है कि यदि विधिक नोटिस की डीम्ड डिलीवरी के बाद 15 दिन का अनिवार्य भुगतान समय पूरा होने से पहले ही शिकायत दर्ज करा दी जाती है, तो वह शिकायत कानून की नजर में अमान्य है। ऐसी समय पूर्व शिकायत पर अदालत संज्ञान नहीं ले सकती। न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने निचली अदालतों के फैसले को पलटते हुए शिकायत को समय से पूर्व पाते हुए आरोपी बसंत की सजा और जुर्माने को रद्द कर दिया है।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोपी बसंत को 5,25,000 रुपये में सेब के 300 डिब्बे बेचे थे। बसंत ने 1,25,000 नकद दिए और बाकी रकम के लिए 4,00,000 का चेक दिया, जो बैंक में पैसे न होने के कारण बाउंस हो गया। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी बसंत को 1 साल की कैद और 4,70,000 मुआवजे की सजा सुनाई थी, जिसे शिमला सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा था।
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मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोपी को 19 अक्तूबर 2016 को कानूनी नोटिस भेजा था। कानून के अनुसार नोटिस भेजने के 30 दिन बाद (यानी 18 नवंबर 2016 को) उसकी डिलीवरी मानी जानी थी। इसके बाद आरोपी को पैसे चुकाने के लिए 15 दिन का अनिवार्य समय मिलना चाहिए था। शिकायतकर्ता ने नोटिस की मियाद (30 दिन) पूरी होने से पहले ही यानी 8 नवंबर 2016 को ही कोर्ट में केस दर्ज कर दिया था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि चेक बाउंस का केस अनिवार्य 15 दिनों का समय दिए बिना समय से पहले दर्ज किया जाता है, तो वह कानून की नजर में कोई शिकायत माना ही नहीं जाएगा। कोर्ट ने कहा कि केस का समय पर दर्ज होना सीधे तौर पर कोर्ट के क्षेत्राधिकार का मामला है। चूंकि यह शिकायत तकनीकी और कानूनी रूप से समय से पहले दर्ज की गई थी, इसलिए आरोपी की सजा को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।
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