केंद्रीय दल ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर नुकसान का जायजा लिया था। सुक्खू ने कहा कि प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब नजर आने लगे हैं। बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारणों और इनके बढ़ते प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करवाना जरूरी है, जिससे भविष्य में आपदा के जोखिम को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें। मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश उत्तर भारत के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने के साथ स्वच्छ वायु उपलब्ध करवाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
उन्होंने राजमार्गों के विकास के दौरान पहाड़ों की कटाई कम करने के लिए अधिक से अधिक सुरंगों के निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इस बैठक में मुख्य सचिव केके पंत, जल शक्ति मंत्रालय के निदेशक प्रकाश चंद, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. सुभाष चंद्रा, ग्रामीण विकास मंत्रालय के निदेशक रामावतार मीणा, निदेशक एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन पुष्पेंद्र राणा, अंतर-मंत्रालय केंद्रीय दल के अन्य सदस्य और प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
आपदा में नुकसान 3412.80 करोड़ के पार, केंद्र से अतिरिक्त मदद की उम्मीद
मानसून के दौरान बादल फटने, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन से नुकसान का कुल आंकड़ा 3412.80 करोड़ रुपये पहुंच गया है। अंतर-मंत्रालय केंद्रीय दल के चार दिवसीय दौरे के समापन पर मुख्य सचिव केके पंत की अध्यक्षता में बैठक हुई। इसमें आपदा से हुए नुकसान का विस्तृत आकलन किया गया। राज्य सरकार ने केंद्र से एनडीआरएफ के तहत जल्द अतिरिक्त वित्तीय सहायता जारी करने की मांग रखी है। बैठक में निदेशक-सह-विशेष सचिव (राजस्व-आपदा प्रबंधन) पुष्पेंद्र राणा ने केंद्रीय दल के समक्ष सड़कों, पेयजल योजनाओं, विद्युत ढांचे और कृषि भूमि समेत विभिन्न क्षेत्रों में हुए नुकसान का ब्योरा दिया गया। केंद्रीय दल ने विभागों को एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के निर्धारित मानकों के अनुरूप क्षति का अंतिम विवरण तैयार करने के निर्देश दिए।
केंद्रीय दल ने कहा कि क्षति से संबंधित सभी आंकड़े अभिलेखों और दस्तावेजों से प्रमाणित होने चाहिए। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि अंतिम ज्ञापन और आकलन प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत अतिरिक्त वित्तीय सहायता के लिए मामला गृह मंत्रालय के समक्ष उठाया जाएगा। मुख्य सचिव ने कहा कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में आपदा के बाद बुनियादी ढांचे की बहाली और पुनर्निर्माण की लागत मैदानी राज्यों की तुलना में अधिक रहती है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के मौजूदा मानकों में संशोधन की आवश्यकता है। उन्होंने केंद्रीय दल से इन परिस्थितियों को केंद्र सरकार के समक्ष रखने का आग्रह किया। पुष्पेंद्र राणा ने कहा कि राज्य के नाजुक हिमालयी भू-भाग को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की बहाली जल्द जरूरी है। सर्दियों को देखते हुए प्रभावित समुदायों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए एनडीआरएफ के तहत सहायता राशि शीघ्र जारी करने की मांग की गई।