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हिमाचल प्रदेश: सतलुज का बदलता बहाव हाइड्रो सेक्टर के लिए चेतावनी, स्थिर उत्पादन पर संकट

Mon, 13 Apr 2026 03:17 PM IST
Ankesh Dogra हर्षित शर्मा, शिमला।

सार

सतलुज का प्रवाह हिमपात आधारित न रहकर तापमान आधारित हो गया है। सतलुज बेसिन में जलवायु परिवर्तन के कारण जल प्रवाह के स्वरूप में आ रहा बदलाव अब जलविद्युत क्षेत्र के लिए गंभीर संकेत दे रहा है। पढ़ें पूरी खबर...
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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हिमाचल प्रदेश के सतलुज बेसिन में जलवायु परिवर्तन के कारण जल प्रवाह के स्वरूप में आ रहा बदलाव अब जलविद्युत क्षेत्र के लिए गंभीर संकेत दे रहा है। इस संबंध में हिमाचल विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज ने अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की है।  सतलुज जल विद्युत निगम को सौंपी रिपोर्ट में पाया गया है कि सतलुज बेसिन में विद्युत उत्पादन हर साल पड़ने वाली बर्फ पर निर्भर न रहते हुए पिघलते हुए हिमखंडों पर ज्यादा निर्भर हो गया है।

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इस कारण अब सतलुज का प्रवाह हिमपात आधारित न रहकर तापमान आधारित हो गया है। अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2020 के बीच ग्लेशियर का क्षेत्रफल 1481.75 से घटकर 1384.16 वर्ग किमी रह गया। साथ ही 1120 ग्लेशियरों का मास बैलेंस नकारात्मक हो चुका है। इससे स्पष्ट है कि बर्फ संचयन की तुलना में पिघलाव अधिक हो रहा है। इसका बड़ा असर नदी के प्रवाह पर पड़ा है। अध्ययन में तापमान और डिस्चार्ज के बीच मजबूत संबंध दर्ज किया गया जो दर्शाता है  कि जल प्रवाह का समय और मात्रा दोनों अधिक अनिश्चित हो गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव से हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को पूरे सीजन में समान रूप से पानी उपलब्ध नहीं हो रहा। पानी का अधिक हिस्सा शुरुआती महीनों में आ रहा  है, जबकि बाद में कमी देखी जा रही है। इससे विशेष रूप से लेट सीजन में बिजली उत्पादन प्रभावित होने के संकेत सामने आए हैं।  नदी में बढ़ती तलछट एक और बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण भूस्खलन, चट्टान गिरने और ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। 

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि सतलुज बेसिन में हो रहे  ये बदलाव दीर्घकालिक हैं। भविष्य में और गहरे हो सकते हैं, जिससे पारंपरिक जल आधारित ऊर्जा मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता सामने आ रही है। हिमकॉस्ट, शिमला के सदस्य सचिव डीसी राणा,  हिमकॉस्ट के संयुक्त सदस्य सचिव डॉ. सुरेश सी. अत्री और स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज की वैज्ञानिक अधिकारी सुश्री कल्पना कुमारी ने यह रिपोर्ट तैयार की है। 
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बर्फ और ग्लेशियर पर 50 से 70% तक निर्भरता 
सतलुज बेसिन की हाइड्रोलॉजी स्वभाव से ही अत्यधिक संवेदनशील मानी जाती है।  अध्ययन के अनुसार नदी के ऊपरी हिस्से में कुल वार्षिक प्रवाह का लगभग 50 से 70 प्रतिशत हिस्सा बर्फ और ग्लेशियर पिघलाव से आता है।  यही कारण है कि ग्लेशियरों में छोटे बदलाव भी पूरे नदी तंत्र और उससे जुड़े हाइड्रो  प्रोजेक्ट्स पर बड़ा असर डालते हैं। जब बर्फ संचयन कम होता है या पिघलाव का समय बदलता है तो इसका प्रभाव सीधे जल उपलब्धता पर पड़ता है। इस उच्च निर्भरता के कारण सतलुज बेसिन को जलवायु परिवर्तन के प्रति हाई-रिस्क हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम माना जा रहा है, जहां छोटे तापमान बदलाव भी बड़े  संचालनात्मक असर पैदा कर सकते हैं।

हाइड्रो सेक्टर के लिए अनुकूलन रणनीति जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि बदलते जल प्रवाह को देखते हुए हाइड्रो  प्रोजेक्ट्स के लिए पारंपरिक संचालन मॉडल पर्याप्त नहीं रहेगा। बेहतर हाइड्रोलॉजिकल पूर्वानुमान, रियल टाइम मॉनीटरिंग और ग्लेशियर व बर्फ की  सतत निगरानी को जरूरी बताया गया है। इसके अलावा जलवायु अनुकूल योजना बनाना  भी आवश्यक माना गया है, जिससे जल उपलब्धता के बदलते पैटर्न के अनुसार संचालन किया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार यदि इन उपायों को समय पर लागू नहीं किया गया तो भविष्य में जलविद्युत उत्पादन की विश्वसनीयता पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।
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