इस कारण अब सतलुज का प्रवाह हिमपात आधारित न रहकर तापमान आधारित हो गया है। अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2020 के बीच ग्लेशियर का क्षेत्रफल 1481.75 से घटकर 1384.16 वर्ग किमी रह गया। साथ ही 1120 ग्लेशियरों का मास बैलेंस नकारात्मक हो चुका है। इससे स्पष्ट है कि बर्फ संचयन की तुलना में पिघलाव अधिक हो रहा है। इसका बड़ा असर नदी के प्रवाह पर पड़ा है। अध्ययन में तापमान और डिस्चार्ज के बीच मजबूत संबंध दर्ज किया गया जो दर्शाता है कि जल प्रवाह का समय और मात्रा दोनों अधिक अनिश्चित हो गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव से हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को पूरे सीजन में समान रूप से पानी उपलब्ध नहीं हो रहा। पानी का अधिक हिस्सा शुरुआती महीनों में आ रहा है, जबकि बाद में कमी देखी जा रही है। इससे विशेष रूप से लेट सीजन में बिजली उत्पादन प्रभावित होने के संकेत सामने आए हैं। नदी में बढ़ती तलछट एक और बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण भूस्खलन, चट्टान गिरने और ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि सतलुज बेसिन में हो रहे ये बदलाव दीर्घकालिक हैं। भविष्य में और गहरे हो सकते हैं, जिससे पारंपरिक जल आधारित ऊर्जा मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता सामने आ रही है। हिमकॉस्ट, शिमला के सदस्य सचिव डीसी राणा, हिमकॉस्ट के संयुक्त सदस्य सचिव डॉ. सुरेश सी. अत्री और स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज की वैज्ञानिक अधिकारी सुश्री कल्पना कुमारी ने यह रिपोर्ट तैयार की है।