प्रशासन ने सोशल इंपेक्ट असेसमेंट के बाद सरकार को भूमि अधिग्रहण की फाइल मंजूरी के लिए भेजी है, लेकिन राज्य सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस देरी के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि भूमि अधिग्रहण की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य के बीच फंसी हुई है। चूंकि यह परियोजना केंद्र की है, इसलिए भूमि अधिग्रहण की लागत कौन वहन करेगा, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। शुरुआत में भानुपल्ली से बिलासपुर रेल लाइन की अनुमानित लागत 4,200 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन देरी और वर्ष 2020 में निर्माण सामग्री की कीमतें बढ़ने समेत अन्य कारणों से लागत सात हजार करोड़ तक पहुंच गई है।
अब एक बार फिर से बिलासपुर तक परियोजना की संशोधित अनुमानित लागत तैयार कर केंद्र को भेजी गई है। यह आंकड़ा 13 हजार करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है। बिलासपुर तक का प्रस्ताव अभी भी केंद्र सरकार के पास लंबित है। इसको रिव्यू किया जा रहा है। रिव्यू के बाद तय किया जाएगा कि संशोधित प्राक्कलन की अनुमानित लागत को कम करना संभव है या नहीं, उसी आधार पर इसे मंजूरी मिलेगी। रेल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार अगर परियोजना का निर्माण और दो साल देरी से शुरू होता है तो अनुमानित लागत में एक हजार करोड़ से ज्यादा की बढ़ोतरी होगी।