शुरुआत में तो सरकार विपक्ष के हमले से सन्न रह गई। कोशिश भी की लेकिन सरकार का शोर मुकेश और जगत सिंह नेगी की बुलंद आवाजों के आगे हल्का ही रहा। अगले दिन से विपक्ष पर पलटवार की जिम्मेदारी राकेश पठानिया और राकेश जम्वाल ने संभाली।
तकरीबन हर मुद्दे पर विपक्ष के हमले पर दोनों राकेशों ने जवाबी हमला कर स्थिति संभाली। दोनों राकेश के जवाबी हमलों का ही नतीजा था कि नेता प्रतिपक्ष को भी यह कहना पड़ गया कि दोनों राकेश सरकार के करीबी हैं और उनके इशारे पर ही आवाज दबा रहे हैं। हालांकि काउंटर हमले का असर तो दिखा लेकिन सरकार की तैयारी में कमी ने उसे मुश्किलों में फंसाए ही रखा।
यू तो सरकार ने अपने प्रयासों और कदमों पर खुद की पीठ थपथपाई, लेकिन विपक्ष ने सरकार के ही फैसलों को उनके खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। जिन मुद्दों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं, उनमें दागी नेताओं पर दर्ज मामले वापस लेना, विधानसभा के एजेंडे में बदलाव करना, एसजेवीएनएल का एनटीपीसी पर मर्जर, आउटसोर्स आधार पर भर्ती करने के निर्णय, सत्र के दौरान मंत्रिमंडल की बैठक कर स्कूल वर्दी के टेंडर रद्द करने, सदन को न बताने और बिगड़ती कानून-व्यवस्था शामिल थे।