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सत्ता संग्राम: हिमाचल में खेती घाटे का सौदा, सरकारों ने नहीं दिया ध्यान

Fri, 29 Sep 2017 01:45 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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हिमाचल में खेती करना घाटे का सौदा है। वजह अन्नदाताओं के प्रति सरकारों की उदासीनता है। 80 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र असिंचित है जहां पर खेती बारिश पर निर्भर है। जैसे तैसे फसल उपजती भी है तो जंगली जानवरों के हमलों से किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है।
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किसानों की सुध लेने के नाम पर कभी सरकार ने करंट वाले बाड़ लगाने को सब्सिडी की योजना बनाई तो कभी मनरेगा के तहत राखे रखने के प्रस्ताव दिए। वर्षा जल संग्रहण के लिए सरकारी योगदान के सपने भी दिखाए। लेकिन राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकारों की योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पाईं। नतीजतन राज्य की एक हेक्टेयर औसत जोत के साथ किसान खेती के पेशे से आजिज आने लगे हैं।

15-20 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न की पैदावार
चावल, गेहूं और मक्की राज्य की प्रमुख खाद्यान्न फसलें हैं। मूंगफली, सोयाबीन और सूूरजमुखी खरीफ मौसम की तथा तिल, सरसों और तोरिया रबी मौसम की प्रमुख तिलहन फसलें हैं। उड़द, बीन, मूंग और राजमा खरीफ और चना व मसूर रबी मौसम की प्रमुख दालें हैं।
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प्रदेश की जलवायु आलू, अदरक और बेमौसमी सब्जियों की पैदावार के लिए भी अच्छा है। प्रदेश में करीब 15 से 20 लाख मीट्रिक टन के बीच ही खाद्यान्न पैदावार होती है। राज्य में 15 लाख मीट्रिक टन के आसपास सब्जियों की पैदावार होती है।

71 फीसदी जनसंख्या की आय का स्रोत

प्रदेश में 71 प्रतिशत जनसंख्या के लिए आय का प्रत्यक्ष स्रोत कृषि है। राज्य के कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 10 फीसदी का योगदान है। करीब 18 से 30 फीसदी क्षेत्र ही सिंचित है। बाकी क्षेत्र खेतीबाड़ी के लिए वर्षा पर ही निर्भर है। कुल जोतों की बात करें तो 87.95 फीसदी जोतें लघु एवं सीमांत किसानों की हैं, जबकि 11.71 प्रतिशत मध्यम और 0.34 प्रतिशत जोतें बडे़ किसानों की हैं।

कुल फसलवाला क्षेत्र 9,40,597 हेक्टेयर
सर्वे के मुताबिक प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्र 55,67,300 हेक्टेयर है। विलेज पेपर के अनुसार यह क्षेत्र 45,59,010 हेक्टेयर है। वन क्षेत्र 11,05,997 हेक्टेयर, बंजर और कृषि के अयोग्य भूमि 7,83,404 हेक्टेयर है। गैर कृषि इस्तेमाल में 3,48,649 हेक्टेयर भूमि है।

चरागाह और चरानयुक्त भूमि 15,03,833 हेक्टेयर है। शुद्ध फसलयुक्त क्षेत्र 5,38,412 है। कुल फसलवाला क्षेत्र 9,40,597 हेक्टेयर है। जोतने योग्य वेस्टलैंड 1,28,224 हेक्टेयर है। हिमाचल प्रदेश में कृषि विभाग वर्ष 1948 मेें शुरू किया गया था। 

1950 में इसका वन विभाग में विलय किया गया। 1952 में इस महकमे ने स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू किया। 1970 में कृषि विभाग को बागवानी महकमे से अलग किया गया। कृषि पर शोध कार्य के लिए चौधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय पालमुपर खोला गया है।

कृषि मंत्री बोले- किसानों के लिए किया बहुत कुछ

कृषि मंत्री सुजान सिंह पठानिया - फोटो : File Photo
कृषि मंत्री सुजान सिंह पठानिया ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने किसानों के उत्थान के लिए कई काम किए हैं। जंगली-जानवरों से निपटने के लिए सरकार बाड़ लगाने को 80 फीसदी सब्सिडी दे रही है। लोगों को सामुदायिक रूप से बाड़ लगाने चाहिए। सिंचाई का सिस्टम विकसित करने में वक्त लगता है।

पुराने ट्यूबवेल दुरुस्त किए जा रहे हैं। सिंचाई योजनाओं पर भी काम चल रहा है। कभी-कभी लोग अपने स्तर पर नदी-नालों से भी टैंकर से टैंकों तक पानी पहुंचाते है। प्रदेश में पानी के स्रोत ही नहीं है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री सिंचाई योजना क्या करेगी?

मोदी जी कह रहे हैं कि वे किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी कर देंगे। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे ये कहना चाह रहे हैं कि जहां एक क्विंटल अनाज होता है, वहां दो क्विंटल होगा। या ये कि जब इतने वक्त में करेंसी का रेट दोगुना होगा तो आय भी खुद ही हो जाएगी।

कांग्रेस सरकार ने सिंचाई पर नहीं किया काम

अर्थव्यवस्था का आधार कृषि रहा है। पिछले कुछ वर्षों से कृषि के क्षेत्र में काम करने वालों की स्थिति अच्छी नहीं है। कोई ठोस नीति और कार्यक्रम नहीं बन पाया है। मृदा कार्ड बनाने का काम हमारी सरकार ने शुरू किया। वर्तमान सरकार में सारे काम ठप पड़े हैं। कांग्रेस सरकार ने सिंचाई पर काम नहीं किया।

ऑफ सीजन की खेती पर विशेष काम करने की जरूरत है। वर्तमान सरकार के मंत्री बेशक खुद एक किसान हैं, लेकिन उन्होंने किसान और खेती में रुचि नहीं दिखाई है। प्रदेश सरकार तो केंद्र सरकार की नीतियों को भी ठीक से लागू नहीं कर पा रही है। - जयराम ठाकुर, विधायक और प्रदेश भाजपा कोर ग्रुप के सदस्य

किसान नेता बोले- मार्केटिंग बोर्ड ने गलत तथ्य देकर ‌लिया पुरस्कार

हिमाचल प्रदेश में सिंचाई सुविधा का अभाव सबसे बड़ी समस्या है। उन्नत किस्मों के बीज होने पर भी किसान लाचार हैं। सौभाग्य से यदि फसल लगती भी है तो जंगल जानवरों के हमलों से फसल को बचाना बड़ी चुनौती बन जाता है।

सरकार ने केवल सोलर फेंसिंग का ही प्रावधान किया गया है। इसमें 80 फीसदी सब्सिडी का प्रावधान तो है, मगर ये फिर भी बहुत महंगी है और ये व्यावहारिक भी नहीं है। आखिरकार जो पैदावार होती है उसे बाजार में अच्छा दाम भी नहीं मिल पाता।

किसानों की इस व्यथा को दूर करने के लिए किसी भी सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं। अभी सरकार ने ई-नाम से एक पुरस्कार भी लिया है। मार्केटिंग बोर्ड ने गलत तथ्य देकर ये पुरस्कार लिया है। इसका किसानों को धरातल पर कोई फायदा नहीं मिल रहा है।
- हरीश चौहान, किसान नेता
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सरकार के दावे खोखले साबित

किसानों की उम्मीदों के अनुसार सिंचाई का पानी देने से लेकर खाद, दवाई और बीज उपलब्ध कराने में सरकारें नाकाम रही हैं। मार्केटिंग की समस्या अलग से बनी हुई है। जंगली-जानवरों से निपटने को सरकार के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। न तो प्रदेश सरकार की नीतियां किसानों का भला कर पाई हैं और न ही केंद्र की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना कोई लाभ नहीं मिला है। 

किसानों के लिए की जाने वाली घोषणाएं हवा-हवाई ही ज्यादा नजर आती हैं। किसान जो कुछ भी पैदावार कर रहे हैं, वे केवल अपने बूते ही कर पा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों को किसानों के एजेंडे को चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने के साथ साथ उन पर अमल भी सुनिश्चित करना चाहिए। - प्रेम दत्त शर्मा, सब्जी उत्पादक
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