हिमाचल में पांच मेडिकल कॉलेजों के अलावा जोनल, जिला अस्पताल और हजारों सीएससी-पीएचसी हैं। बावजूद इसके सूबे की जनता की सेहत बाहरी राज्यों के अस्पतालों पर ज्यादा टिकी है। प्रदेश के कई स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टर नहीं हैं तो कहीं पैरा मेडिकल स्टाफ। किसी चिकित्सा केंद्र में एक्स-रे मशीन अरसे से खराब पड़ी है तो कहीं डिस्पेंसरियां चपरासी के हवाले हैं।
कहीं मेडिकल टेस्ट तक की सुविधा नहीं है। गंभीर रोगों का इलाज तो दूर, छोटी-मोटी बीमारियों पर भी मरीजों को रेफर किया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति पीएचसी और सीएचसी स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों की नहीं जिला स्तर के अस्पतालों की भी है। हिमाचल के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान आईजीएमसी से भी मरीजों को इलाज के लिए बाहर रेफर किया जा रहा है।
कई मेडिकल टेस्ट की सुविधा यहां भी नहीं है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए प्रदेश के लोग बाहरी राज्यों का रुख करने के लिए मजबूर हैं। बीते साल राजधानी में पीलिया फैलने से 22 लोगों की मौत हो गई जबकि 15000 लोग इसकी चपेट में आ गए।
डॉक्टर तक पीलिया के इलाज के लिए झाड़ फूंक करने वालों के यहां पहुंचे। इस साल आईजीएमसी के रेडियोलॉजी विभाग के एचओडी ने स्वाइन फ्लू से अपने ही अस्पताल में दम तोड़ दिया। ऐसी बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से परेशान जनता अब विधानसभा चुनाव में कई नेताओं की सियासी सेहत बिगाड़ सकती है।
सेहत के लिए महज 4.53 फीसदी बजट
राज्य सरकार का चालू वित्त वर्ष में कुल पारित बजट 37,939 करोड़ रुपये है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मद में सरकार ने कुल 1720 करोड़ की राशि का प्रावधान किया है। यह राज्य के कुल बजट का महज 4.53 फीसदी ही है।
20 हजार पदों में से चार हजार खाली
हिमाचल प्रदेश में तमाम चिकित्सा केंद्रों सहित पूरे स्वास्थ्य महकमे में चिकित्सकों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों तक विभिन्न श्रेणियों के करीब 20 हजार पद सृजित हैं। इनमें से चार हजार से ज्यादा पद रिक्त चल रहे हैं। इनमें से चिकित्सकों के मंजूर पद करीब 2000 हैं। इनमें से लगभग चार सौ पद खाली हैं।
स्टाफ नर्स के 3000 हजार मंजूर पदों में से 600 से अधिक पद रिक्त हैं। प्रयोगशाला तकनीशियनों और सहायकों के 1000 से पद स्वीकृत हैं। इनमें से आधे पद खाली हैं। महकमे में लगभग 130 श्रेणियों के पद सृजित हैं। इनमें से अधिकतर श्रेणियों में से किसी में भी सभी पदों को भरा नहीं जा सका है।
पेट स्कैन मशीन तक नहीं जुटा पाया हिमाचल
स्वास्थ्य सेवाओं का आधारभूत ढांचा विकसित करने में हिमाचल विफल रहा है। राज्य में कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बागवानी बेल्ट में तो हर गांव में एक या दो मरीज कैंसर के सामने आने लगे हैं। कैंसर निरीक्षण के लिए पोजीट्रोन एमीशन टोमोग्राफी (पेट) स्कैन जरूरी होता है।
आईजीएमसी शिमला से संबद्ध कैंसर अस्पताल मेें पेट स्कैन मशीन नहीं लग पाई है। आईजीएमसी शिमला छोड़िए, जोनल अस्पताल शिमला में एक्स-रे की मशीन महीनों खराब रहती है। राज्य के एकमात्र सरकारी डेंटल कॉलेज में भी जबडे़ के एक्स-रे की मशीन अक्सर गड़बड़ ही रहती है। प्राइवेट संस्थानों में पैसा बहाकर ही लोगों को ऐसे कई महत्वपूर्ण टेस्ट करने होते हैं।
वीआईपी नहीं करवाते हिमाचल में इलाज
प्रदेश के कई वीआईपी हिमाचल में इलाज नहीं करवाते। कई मंत्री, नेता और अफसर इसके उदाहरण हैं। ये वीआईपी पीजीआई चंडीगढ़, फोर्टिस मोहाली, एम्स दिल्ली या देश के अन्य बडे़ चिकित्सा संस्थानों में इलाज करवाने जाते हैं।
पिछले कुछ दशकों की बात करें तो स्वास्थ्य महकमा देखने वाले सभी सरकारों के मंत्री भी बाहरी अस्पतालों में ही उपचार करवाते रहे हैं। गरीब और आम मरीजों के यहां पहुंचने पर अधूरे इंतजाम पोल खोल देते हैं।
कई राज्यों से बेहतर है हिमाचल: कौल सिंह
स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर की मानें तो हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं देश के कई राज्यों से बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कई बार गंभीर बीमारियों की स्थिति में मरीजों को पीजीआई या अन्य अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है।
इसके बावजूद हिमाचल में स्वास्थ्य क्षेत्र में कई सुधार किए जा रहे हैं। अस्पतालों में जरूरत के अनुसार उपकरण दिए जा रहे हैं। स्टाफ की कमी भी दूर की जा रही है।
कैंसर का उपचार हो या ब्रेन सर्जरी। हर तरह का उपचार हिमाचल में उपलब्ध है। गुलाम नबी आजाद के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहते हिमाचल को विशेष मदद मिली थी।
पांच साल में एक भी नई योजना नहीं: डॉ बिंदल
पूर्व भाजपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे डॉ. राजीव बिंदल का कहना है कि इस सरकार में ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं पूरी तरह से चरमरा गई हैं। पिछले पांच साल में एक भी नई योजना शुरू नहीं की गई है।
एमआरआई, सीटी स्कैन आदि की तिथि तीन-तीन महीने बाद मिल रही है। भाजपा सरकार ने 108 एंबुलेंस शुरू की थी। हेल्थ कार्ड बीमा योजना चलाई। इस सरकार ने तो चार साल में हेल्थ कार्ड तक रिन्यू नहीं किए हैं। सुपर स्पेशिलिटी सुविधाओं की भी हालत भी खराब है।
मरीजों से अस्पताल फुल, स्टाफ खाली
बिलासपुर- अस्पताल पिछले कई महीनों से बिना किसी सर्जन के है। केवल एक एमबीबीएस डॉक्टर के सहारे ही व्यवस्था चल रही है। मरीजों के लिए उपचार लेना यहां टेढ़ी खीर बना हुआ है।
कुल्लू- क्षेत्रीय अस्पताल कुल्लू में चिकित्सकों के कुल 37 स्वीकृत पदों में से सात विशेषज्ञों सहित 18 चिकित्सकों के पद खाली पड़े हैं। रोजाना करीब 800 मरीज उपचार को पहुंचते हैं। डॉक्टर न मिलने से मरीजों की जान पर बन आती है।
इन अस्पतालों में ये हैं हाल
टांडा मेडिकल कॉलेज
- फोटो : File Photo
चंबा- पंडित जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज चंबा में रोजाना 300 से अधिक मरीज आते हैं। यहां सीटी स्कैन की सुविधा नहीं है। इमरजेंसी कक्ष में एक स्टाफ नर्स के हवाले 13 बेड हैं।
हमीरपुर- क्षेत्रीय अस्पताल हमीरपुर में चिकित्सकों के 29 पद स्वीकृत हैं। इनमें से नौ चिकित्सकों के पद अरसे से खाली हैं। मेडिकल स्पेशलिस्ट और सर्जन न होने के कारण रोजाना 40 से 50 रोगी दूसरे जिलों और राज्यों के अस्पतालों में रेफर हो रहे हैं। अस्पताल में रखी दो डायलिसिस की मशीनें धूल फांक रही हैं।
कांगड़ा- स्मार्ट सिटी धर्मशाला के जोनल अस्पताल में डिजिटल एक्स-रे, पीसीआर और सीवीनेट जैसी अत्याधुनिक लैबों और मशीनों का अभाव है। मरीजों को निजी अस्पतालों या टांडा मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है।
वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक सहित डाक्टरों के 37 पदों में से 14 पद रिक्त हैं। पैरा मेडिकल और अन्य स्टाफ के कई पद खाली पड़े हैं। आठ महीने से चर्म रोग विशेषज्ञ नहीं है। गायनी में तीन डॉक्टरों की जरूरत है लेकिन सिर्फ एक डॉक्टर तैनात है।
मंडी- जिला अस्पताल मंडी की आपातकालीन ओपीडी मात्र एक डाक्टर के सहारे चल रही है। ओपीडी में दिनभर करीब 200 से 250 मरीज आते हैं। दिनभर मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं।
इससे डाक्टर ही नहीं बल्कि पूरा दिन यहां पर अपनी जांच के लिए खड़े होने वाले लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
यहां मरीजों की तादाद दोगुना
सोलन- स्थानीय अस्पताल में 200 बिस्तरों की क्षमता है लेकिन मरीजों की तादाद दोगुना रहती है। रोजाना एक हजार से ज्यादा की ओपीडी वाले अस्पताल में ढाई सौ से 300 मरीज दाखिल रहते हैं।
अस्पताल पर चार विस क्षेत्रों के मरीज निर्भर हैं। हरियाणा और पंजाब से सटे इलाकों तक से लोग यहां उपचार के लिए आते हैं। मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद यहां डॉक्टरों के स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने की भी जरूरत है।
ऊना- नगर पंचायत गगरेट के सरकारी अस्पताल में न तो कोई विशेषज्ञ चिकित्सक और न ही कोई शिशु, महिला रोग विशेषज्ञ सहित अन्य डाक्टरों की तैनाती हुई है।
रोजाना 200 से 250 की ओपीडी वाले इस अस्पताल में अभी भी मात्र तीन चिकित्सक हैं। नेशनल हाइवे पर बने अस्पताल में गगरेट विस क्षेत्र के दर्जनों गांवों के लोग स्वास्थ्य सेवाएं लेने के लिए आते हैं। धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की भी आवाजाही रहती है।
सिरमौर- डॉ. वाईएस परमार मेडिकल कालेज नाहन रेफरल अस्पताल बनकर रह गया है। 800 से ज्यादा ओपीडी वाले इस अस्पताल में सुविधाओं के अभाव में ज्यादातर केस पीजीआई चंडीगढ़ के लिए रेफर किए जा रहे हैं।
ओपीडी के बाहर मरीजों के बैठने की सुविधा नहीं मिलती। कई गर्भवती महिलाएं फर्श पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करती हैं। जनपद सिरमौर में सड़क दुर्घटनाओं के घायलों प्राथमिक उपचार ही मिल पाता है। मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ का टोटा है।