कंपनी का आरोप था कि अगस्त 2009 में इन ऑपरेटरों और हेल्परों ने फैक्टरी में काम रोककर अन्य श्रमिकों को हड़ताल के लिए उकसाया था। घरेलू जांच के बाद मार्च और जुलाई 2010 में सभी को बर्खास्त कर दिया गया। हालांकि, लेबर कोर्ट शिमला ने दिसंबर 2015 में पाया कि कंपनी की घरेलू जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी। लेबर कोर्ट ने 2018 में कर्मचारियों को वरिष्ठता और सेवा निरंतरता के साथ बहाल करने का आदेश दिया, लेकिन पिछला वेतन देने से इन्कार कर दिया। इसके खिलाफ कर्मचारी हाईकोर्ट पहुंचे। एकल पीठ ने कंपनी को 50 फीसदी बैक वेज और उस पर ब्याज देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कर्मचारियों की सेवा अवधि और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए 50 फीसदी बैक वेज और ब्याज के आदेश को उचित माना तथा दोनों पक्षों की अपीलें खारिज कर दीं।