गीता देवी ने साल 2019 में ट्रिब्यूनल के समक्ष एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने 1996 में मातृत्व अवकाश और 1998 में बीमारी के कारण हुए सेवा अंतराल को निरंतर सेवा मानने की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने उसी दिन राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का मौका दिए बिना याचिका स्वीकार कर ली और कर्मचारी को 10 साल की सेवा के आधार पर वर्क चार्ज स्टेटस और अन्य लाभ देने का आदेश दे दिया।
खंडपीठ ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने सरकार को पक्ष रखने या जवाब दाखिल करने का अवसर दिए बिना ही मामला निपटा दिया। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। अदालत ने कहा कि हम ट्रिब्यूनल की ऐसी कार्यप्रणाली का समर्थन नहीं कर सकते। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 21 के तहत ट्रिब्यूनल को ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने पर रोक है जो समय सीमा के बाहर हो।