अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16 के तहत समय पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाना कर्मचारी का एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। यदि पद खाली था और कर्मचारी तमाम योग्यताएं पूरी करता था, तो विभाग की ओर से सालाना विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक न बुलाना एक प्रशासनिक चूक है। इस ढिलाई का खामियाजा कोई भी कर्मचारी नहीं भुगतेगा। सरकार के कार्मिक विभाग के नियमों के अनुसार, हर साल के पहले क्वार्टर में खाली या संभावित पदों के लिए डीपीसी कराना अनिवार्य है, ताकि समय पर पैनल तैयार हो सके।
मामला लोक निर्माण विभाग से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता सुभाष चंद्र वर्ष 1977 में पीडब्ल्यूडी में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हुए थे।वर्ष 2003 में असिस्टेंट इंजीनियर का पद खाली हुआ, जिसके लिए याचिकाकर्ता पूरी तरह योग्य और वरिष्ठता सूची में सबसे आगे थे।विभाग ने समय पर डीपीसी की प्रक्रिया पूरी नहीं की।
जब वर्ष 2006 में डीपीसी बुलाई गई, तो उन्हें पदोन्नत तो कर दिया गया, लेकिन इसे 2003 के बजाय 2006 से प्रभावी माना गया। विभाग ने तर्क दिया था कि नियमों के तहत पदोन्नति केवल आगे की तारीख से ही दी जा सकती है।उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के उस आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता को बैकडेट से पदोन्नति देने से इन्कार किया गया था। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2003 से ही असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोट माना जाए और उन्हें उस अवधि के सभी वित्तीय व परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं।