अदालत ने डॉ. विनोद कुमार धवन की ओर से दायर जनहित याचिका में यह आदेश दिया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 तथा खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011 के वैधानिक प्रावधानों को लागू करने की मांग थी। इसके तहत सभी खाद्य प्रतिष्ठानों को अपने बिलों, मेन्यू और डिस्प्ले बोर्ड पर स्पष्ट रूप से यह घोषित करना होगा कि वे असली पनीर, चीज दे रहे हैं या कृत्रिम। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता की ओर से 18 मई 2026 को दिए गए कानूनी नोटिस के बाद प्रदेश सरकार ने 24 जून 2026 को एक बड़ा कदम उठाया था।
सरकार ने राज्य के सभी सहायक आयुक्तों (खाद्य सुरक्षा) को लिखित निर्देश जारी किए थे कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के सभी होटलों, फास्ट-फूड आउटलेट्स, कैटरर्स और ऑनलाइन डिलीवरी कंपनियों को 2011 के नियमों के तहत मेन्यू, बिल और डिस्प्ले बोर्ड पर सही जानकारी दर्शाने के कड़े निर्देश दें। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि सरकार के निर्देशों में सैंपलिंग और टेस्टिंग (खाद्य पदार्थों की प्रयोगशाला में जांच) और उसके रिकॉर्ड को बनाए रखने का अहम हिस्सा छूट गया है, जो भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के नियमों के तहत अनिवार्य है। इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वह राज्य सरकार के 24 जून के आदेश में रह गई इस कमी या अस्पष्टता को लेकर संबंधित अधिकारियों के समक्ष एक नया अभ्यावेदन दायर कर सकते हैं।