वैदिक ज्योतिष के अनुसार, देवगुरु बृहस्पति 15 जुलाई से 9 अगस्त 2026 तक अस्त रहेंगे। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ जैसे कई मांगलिक और शुभ कार्यों पर लगभग 25 दिनों तक विराम रहेगा। यह संयोग चतुर्मास के आरंभ के साथ हो रहा है, जिसके कारण धार्मिक दृष्टि से भी इन शुभ कार्यों को टालने की परंपरा है।
गुरु का अस्त होना और उसका प्रभाव
वर्तमान में बृहस्पति कर्क राशि के पुष्य नक्षत्र में गोचर कर रहे हैं। 16 जुलाई के आसपास सूर्य के भी कर्क राशि में प्रवेश करने से ये दोनों ग्रह अत्यंत निकट आ जाएंगे। जब बृहस्पति सूर्य से लगभग 11 डिग्री के भीतर आ जाता है, तो उसे 'अस्त' या 'दग्ध' माना जाता है। सूर्य की प्रखर आभा के कारण बृहस्पति दृष्टिगोचर नहीं होता और ज्योतिष में उसकी शुभता का प्रभाव कमजोर माना जाता है।
राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश नौटियाल के अनुसार, वैदिक ज्योतिष में गुरु को ज्ञान, धर्म, शिक्षा, संतान, समृद्धि और शुभता का कारक ग्रह माना गया है। गुरु के अस्त रहने की अवधि में उसके शुभ प्रभाव में कमी आती है, जिससे कुछ लोगों को कार्यों में विलंब, निर्णय लेने में कठिनाई या अन्य प्रकार की रुकावटों का अनुभव हो सकता है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति पर इसका प्रभाव उसकी जन्मकुंडली, ग्रह दशा और अन्य ज्योतिषीय योगों पर निर्भर करता है।
किन राशियों पर पड़ेगा विशेष प्रभाव?
इस अवधि में विशेष रूप से कर्क, धनु, मकर और मीन राशि के जातकों को धैर्य और संयम के साथ कार्य करना चाहिए।
इस अवधि में क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु के अस्त रहने की अवधि में गुरु बीज मंत्र का जाप, भगवान विष्णु की उपासना, पीले वस्त्र व पीली वस्तुओं का दान और ध्यान-योग करना शुभ माना गया है। पुजारी उमेश नौटियाल बताते हैं कि गुरु अस्त की अवधि आध्यात्मिक साधना, आत्मचिंतन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है, जबकि मांगलिक कार्यों को इस अवधि के बाद करना अधिक शुभ माना जाता है।