राज्यपाल ने कहा कि वैदिक काल में महिलाओं और पुरुषों को एक समान दर्जा प्राप्त था। दोनों के जीवन पर किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राजा जनक की भेंट एक बार एक नौजवान युवती से हुई थी, जिसने गेरुवें वस्त्र धारण किए हुए थे। तब राजा ने उससे सवाल किया था कि इस जवानी में वह गेरुवे वस्त्र क्यों धारण किए हुए हैं। इस पर उस युवती ने जवाब दिया कि वह ऐसे पुरुष से शादी करेगी जो उसे शास्त्रार्थ में हरा सके, लेकिन आज तक ऐसा कोई नहीं मिला। इसलिए समय बरबाद न करते हुए वह संन्यासी बन गई है। अब वह इस प्रकार से ही अपना जीवन व्यतीत करेगी।
मध्य युग में महिलाओं ने सहे कई अत्याचार
आचार्य देवव्रत ने कहा कि मध्य युग में विदेशी आक्रमणकारियों के आने से देश में महिलाओं पर अत्याचार बढ़े। इसी कारण यहां पर पर्दा प्रथा ने भी जन्म लिया और महिलाएं चारदीवारी में कैद हो गईं। उन्होंने कहा कि उस समय के कवियों और साहित्यकारों ने भी महिलाओं के चरित्र पर कई बातें बनाकर उनको हानि पहुंचाई। महिलाओं को शिक्षा दिलाने वालों को समाज से तिरस्कृत कर दिया जाता था।
समाज सुधारकों ने महिलाओं को दिलाया समाज में स्थान
राज्यपाल ने कहा कि राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती और श्रद्धानंद जैसे समाज सुधारकों ने महिलाओं को समाज में एक बार फिर स्थान दिलाया है। उनके प्रयासों से ही महिला विरोधी कई प्रथाओं का अंत हुआ। आज के युग में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कहीं अधिक आगे हैं। हर क्षेत्र में महिलाएं ऊंचाईयों को छू रही हैं। उन्होंने कहा कि आज जब वह किसी भी विश्वविद्यालय में पारितोषिक वितरण को जाते हैं तो 100 में से 80 पारितोषिक बेटियां ही ले जाती हैं।
करुणा, दया, सहनशीलता में नारी का सानी नहीं
महिलाओं को सर्वोच्च दर्जा देते हुए राज्यपाल ने कहा कि महिलाएं करुणा, दया और सहनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल हैं। अगर किसी महिला का पति गुजर जाता है तो वह अपने बच्चों को हजारों कठिनाइयां सहकर भी पढ़ा लिखाकर योग्य बना देती हैं, लेकिन अगर किसी की पत्नी गुजर जाए तो बहुत विरले ऐसे लोग होते हैं, जो अपने बच्चों को योग्य बना पाते हैं।