ग्लोबल वार्मिंग से हिमाचल झील बम की नई परेशानी से घिरता जा रहा है। अभी तक कम होती बर्फबारी से परेशान हिमाचल को अब पिघलते ग्लेशियरों की वजह से बन रहीं नई झीलों से खतरा पैदा हो गया है।
स्टेट सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज की ओर से किए गए शोध में यह बात सामने आई है कि पिछले दो सालों में ग्लेशियर के पिघलने से दो सौ से ज्यादा नई झीलें बनी हैं। खास बात यह है कि इनकी न तो निगरानी हो रही है और न ही इनका कोई डाटा रिकॉर्ड किया जा रहा है।
ऐसे में ये झीलें बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। रिसर्च की मानें तो चिनाब, रावी, व्यास और सतलुज नदी के किनारों पर सबसे ज्यादा ग्लेशियर पिघलने की बात सामने आई है। रिसर्च से जुड़े एसएस रंधावा ने बताया कि 1994 में सतलुज बेसिन के आसपास 38 झीलें थीं।
पिछले बीस सालों में यह संख्या बढ़कर 390 पहुंच गई हैं। ग्लेशियरों से बन रही इन झीलों की मॉनीटरिंग की जरूरत बढ़ गई है। उत्तराखंड और नेपाल में कई घटनाओं का उल्लेख करते हुए रंधावा ने कहा कि ये झीलें बढ़ने से प्रदेश में ग्लेशियर पिघलने से झीलों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। वर्तमान में सिर्फ तिब्बत से सटी स्पीति बेसिन में बने परेचू झील की ही निगरानी हो रही है।
दो साल में बनी 109 छोटी-बड़ी झीलें
स्टडी के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले दो साल के दौरान ही चिनाब, रावी और व्यास नदी के आसपास 109 झीलें बन गई हैं। रंधावा ने बताया कि चेनाब बेसिन में 2013 तक महज 116 झीलें थीं, वहीं 2015 में उनकी संख्या बढ़कर 192 हो गई। 2001 तक इस बेसिन में महज 55 झीलें ही थीं।
पांच से दस हेक्टेयर है झीलों का क्षेत्रफल
रंधावा ने बताया कि दो साल में बढ़ी झीलें साइज में काफी बड़ी हैं। सतलुज बेसिन में भले ही नई झीलें कम बनीं, लेकिन इस एरिया में बनने वाली झीलें काफी बड़े क्षेत्रफल की हो गई हैं। दस झीलें ऐसी हैं, जिनका क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से ज्यादा है। 45 झीलें ऐसी हैं, जिनका क्षेत्रफल पांच से दस हेक्टेयर के बीच है।
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय के ग्लेशियरों को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। ऐसे में इन नए पानी के स्रोतों और झीलों की निगरानी करना बेहद जरूरी है। ऐसा न करने पर झीलों के फटने और उत्तराखंड त्रासदी जैसी घटनाएं हो सकती हैं।- तरुण कपूर, प्रधान सचिव वन एवं पर्यावरण