16 नवंबर 1995 से भविष्य निधि संगठन ने अपने अंशधारकों के लिए पेंशन स्कीम शुरू की थी। स्कीम में प्रावधान था कि कर्मचारी और नियोक्ता इस योजना में नियोक्ता के अंशदान में से कर्मचारी के मूल वेतन और महंगाई भत्ते की कुल राशि का 8.33 फीसदी या 5000 रुपये में से अधिकतम का 8.33 फीसदी हिस्सा ही जमा करवा सकता था।
बाद में 6500 रुपये और 15000 रुपये किया गया। योजना में वर्ष 1996 में भविष्य निधि संगठन ने एक संशोधन किया जिसके तहत कर्मचारी और नियोक्ता अगर चाहे तो नियोक्ता के हिस्से में से इस पेंशन स्कीम में कर्मचारी के मूल वेतन और महंगाई भत्ते की कुल राशि का 8.33 फीसदी हिस्सा बिना किसी अधिकतम सीमा के जमा करवा सकते थे।
इसी के अनुरूप इन्हें बढ़ी हुई पेंशन मिलनी थी। इस संशोधन का पता कर्मचारियों को उस समय नहीं चला, लेकिन जब पता चला तो कर्मचारियों ने इस मामले को अपने नियोक्ताओं के माध्यम से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के समक्ष उठाया। संगठन ने कर्मचारियों की इस मांग को अस्वीकार कर दिया। जिसके चलते कर्मचारियों को कोर्ट की शरण में जाना पड़ा।