कैंसर और शुगर की बीमारी के लिए रामबाण सीबकथार्न (छरमा) को जापानी इंटरनेशनल कॉपरेशन एजेंसी (जायका) प्रोजेक्ट के तहत विकसित करने की कवायद फिर शुरू हुई है। जायका के अंतर्गत लाहौल-स्पीति जिला में वन विभाग के जरिये छरमा के पौधों को लगाया जाएगा और इसका लाभ स्थानीय लोगों को दिया जाएगा। 800 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में छरमा की खेती सबसे ऊपर है।
मंगलवार को इसी को लेकर देवसदन में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। वन विभाग और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान मौहल के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस सेमिनार में वन विभाग के साथ कृषि विभाग पालमपुर, पर्यावरण वैज्ञानिकों और अन्य विशेषज्ञों ने छरमा को लेकर जरूरी टिप्स दिए।
इधर, अतिरिक्त मुख्य सचिव वन विभाग तरुण कपूर ने बताया कि छरमा की पौध को वन विभाग की ओर से लगाया जाएगा। इससे घाटी के करीब 15 हजार लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में रोजगार मिलेगा। वन विभाग की प्लानिंग चल रही है। इससे पूरा जनजातीय क्षेत्र लाहौल-स्पीति को कवर किया जाएगा। शोध में कैंसर व शुगर की बीमारी के लिए रामबाण माने जाने वाले छरमा में विटामिन-सी और प्रोटीन सबसे अधिक मात्रा में पाई गई है।
भारत में चीन के साथ लगते क्षेत्र छरमा के लिए उपयोगी हैं। इनमें हिमाचल के तीनों जनताजीय हलके लाहौल-स्पीति, पांगी-भरमौर और किन्नौर शामिल हैं। लाहौल-स्पीति की पट्टन घाटी छोड़ पूरे जनजातीय क्षेत्रों को सीबकथार्न के लिए अनुकूल माना गया है।
पांच कंपनियों ने की 1900 टन छरमा की मांग
हिमाचल में 1900 टन छरमा की मांग पांच कंपनियों ने की है। पतंजलि ने सबसे अधिक एक हजार टन छरमा की डिमांड की है। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रोफेसर एवं छरमा पर काम करने वाले प्रो वीरेंद्र सिंह ने कहा कि कृषि विभाग लाहौल के किसानों को छरमा की दस नई रशियन किस्मों को आवंटित करेगा। छरमा की खेती 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में होती है।
कुल्लू और रामपुर में खुलेंगे जायका के कार्यालय
जापानी इंटरनेशनल कॉपरेशन एजेंसी (जायका) प्रोजेक्ट के तहत 800 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। लाहौल में छरमा के साथ कुल्लू-किन्नौर और शिमला जिला में पर्यटन और ईको टूरिज्म को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इसके संचालन के लिए जिला मुख्यालय ढालपुर और रामपुर में कार्यालय खोले जाएंगे।