बौद्ध धर्म में चंद्राभागा नदी के तांदी संगम के ऊपर स्थित ड्रिलबुरी चोटी की एक परिक्रमा को कैलाश पर्वत की 13 परिक्रमा करने के बराबर माना गया है। भूटान से लाहौल पहुंचे ड्रग्पा संप्रदाय के दूसरे सबसे बड़े अवतारी लामा खमटुल रिंपोंछे ने तुपचीलिंग बौद्ध मठ में प्रवचन के दौरान यह बात कही।
रिंपोंछे के नेतृत्व में करीब 5 हजार बौद्ध अनुयायियों ने 4400 मीटर ऊंची ड्रिलबुरी चोटी की पैदल परिक्रमा की। रिंपोंछे ने कहा कि दुनिया में आज चारों तरफ अशांति और उपद्रव का बोलबाला है। ऐसे हालात में केवल धर्म ही दुनिया को इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता बता सकता है।
आर्यावलोकितेश्वर समाधि पाठ करते हुए रिंपोंछे ने कहा कि जो व्यक्ति बुद्ध की शरण में रहता है, वही सच्चा बुद्ध कहलाता है। जब तक संसार शून्य नहीं हो जाता, तब तक महानिर्वाण को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
जीवन में हम किसी भी पेशे से जुड़े रहें, लेकिन आमदनी का कुछ हिस्सा धर्म पर भी खर्च करें। रिंपोंछे ने शुक्रवार को तुपचीलिंग मठ में लाहौल-पांगी घाटी के अलावा वियतनाम, भूटान, नेपाल, चीन और यूरोपियन देशों से आए बौद्ध अनुयायियों को प्रवचन दिए।
यंग ड्रकपा एसोसिएशन लाहौल-स्पीति, लद्दाख, भूटान और नेपाल के स्वयंसेवियों ने धार्मिक कार्यक्रम में शिरकत की। कुंगा रिंपोंछे विशेष तौर पर मौजूद रहे। यंग ड्रग्पा एसोसिएशन के अध्यक्ष जंगपो, कोषाध्यक्ष दोरजे लार्जे ने कहा कि तीन साल पहले उनके संस्था के आग्रह पर ड्रिलबुरी परिक्रमा की नींव पड़ी है।
भूटानी रिंपोंछे ने हिंदी में दिया प्रवचन
भूटान के रहने वाले खमटुल रिंपोंछे ने हिंदी में प्रवचन देकर भारतीय बौद्ध अनुयायियों का दिल जीत लिया। सामान्य तौर पर अधिकतर अवतारी बौद्ध रिंपोछे भोटी या अंग्रेजी में ही प्रवचन देते हैं, लेकिन खमटुल रिंपोंछे ने एक साल के भीतर हिंदी भाषा सीख ली।