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Himachal: हिमाचल के हुनरमंद हाथों की पूरी दुनिया दीवानी, हस्तशिल्प और हथकरघा का समृद्ध खजाना

Mon, 05 Sep 2022 01:57 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

 हिमाचल के पत्थर शिल्प और काष्ठ कला का भी कोई सानी नहीं है। इस सफलता का सीधा श्रेय सूबे के कारीगरों और बनुकरों के हुनरमंद हाथों को ही जाता है। 
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हिमाचल के हुनरमंद हाथों की पूरी दुनिया दीवानी - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हिमाचल देवी-देवताओं और वीरों की भूमि ही नहीं हुनरमंद हाथों की भी जननी है। प्रदेश में हस्तशिल्प और हथकरघा के समृद्ध खजाने को यहां के शिल्पी और बुनकरों के हुनरमंद हाथ न सिर्फ संवार रहे हैं बल्कि मजबूती से आगे भी बढ़ा रहे हैं। आधुनिक जमाने के बदले परिवेश में भी पारंपरिक विरासत को सहेजे हिमाचली हस्तशिल्प और हथकरघा की धमक आज भी कायम है। बात चाहे ‘सुई के आश्चर्य’ के तौर पर चंबा रुमाल की हो या फिर धातु शिल्प के कमाल चंबा थाल की। कुल्लू-किन्नौर के शॉल और पूलों की या फिर कांगड़ा की पेंटिंग-लिखणु कला और सिरमौरी लोईया की। हिमाचल के पत्थर शिल्प और काष्ठ कला का भी कोई सानी नहीं है। इस सफलता का सीधा श्रेय सूबे के कारीगरों और बनुकरों के हुनरमंद हाथों को ही जाता है। पेश है रोशन ठाकुर, सुभाष अग्निहोत्री हितेश शर्मा और मोहिंद्र सिंह की रिपोर्ट...

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द्वार लेखन देता है शुभ समारोह का संकेत
हिमाचल प्रदेश में द्वार लेखन या भित्ती लेखन की परंपरा प्राचीन समय से प्रचलित है। आज भी घर में जब कोई शादी समारोह या मुंडन का अवसर हो तो यह कला घर के द्वार पर शुभ समारोह का संकेत देती है। इस कला को लेकर ऐसा कहना है कि पहले समय में जब संसाधनों का अभाव था तब गांवों में शादी-समारोहों में प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग किया जाता था। उस समय घर में लगने वाले स्वागत द्वार के लिए घर के आंगन के मुख्य द्वार पर बांस के दो डंडों के सहारे चीड़ की पत्तियों के साथ स्वागत गेट बनाया जाता था, जो सीधे तौर पर यह संदेश होता था कि घर में कोई शादी या मुंडन समारोह है। द्वार लेखन का इतिहास : हिमाचल में द्वार लेखन की कला का इतिहास 20वीं सदी से ही देखा जा सकता है। चित्रकला के रूप में इसका जनक चितरेरे (बढ़ई) को माना जा सकता है। इन्होंने इस कला को चित्रकला के रूप में प्रयोग किया। धीरे-धीरे यह लेखन परंपरा शादी समारोहों से लेकर मुंडन शुभ कामों में प्रचलित होने लगी।
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पक्के मकानों के साथ गुम होने लगी कलाः  प्रदेश में जैसे-जैसे पक्के मकानों का प्रचलन बढ़ने लगा, वैसे ही घरों से द्वार लेखन की परंपरा विलुप्त होने लगी। अब शादी-विवाहों में द्वार लेखन के लिए बाजार में कागज पर बने द्वार लेखन को प्रयोग किया जाता है, जिससे घरों की दीवारों पर कोई असर न हो। हालांकि, अभी भी कांगड़ा कला संग्रहालय में चित्रों के रूप में इस लेखन को उकेरा गया है।

पहाड़ी संस्कृति-सभ्यता का परिचायक सिरमौरी लोईया  

सिरमौरी लोईया - फोटो : अमर उजाला
सिरमौर की समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता का परिचायक लोईया प्रदेश ही नहीं देश-विदेश में भी काफी प्रसिद्ध है। लोईया सिरमौर के ट्रांसगिरि क्षेत्र की पहचान और पारंपरिक वेशभूषा है, जिसे विशेषकर सर्दियों के दौरान इस क्षेत्र के लोग शौक से पहनते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में मुख्यातिथि को सम्मान के तौर पर लोईया भेंट करने की परंपरा आज भी जारी है। पारंपरिक तौर पर सर्दियों के मौसम में वस्त्रों के ऊपर पहना जाने वाला लोईया ऊन का बना होता है। आजकल यह अन्य ऊनी व सूती मिश्रित पट्टियों का भी बनाया जा रहा है। भेड़-बकरियों के पेशे से जुड़े अधिकांश लोग ऊन को स्वयं काता करते हैं और ग्रामीण स्तर पर ही स्थानीय बुनकरों से नौ ईंच चौड़ी पट्टी बुनवाई जाती है। उन पट्टियों को जोड़कर ही लोईया बनाया जाता है।

लोईया कश्मीर में पहने जाने वाली फेरन से मिलता जुलता है, लेकिन उसमें बाजू होते हैं। ग्रामीण लोईये का उपयोग कई प्रकार से करते हैं। उन्हें इससे सर्दियों में ठंड से राहत मिलती है और किसान बागवान जब कोई बोझ पीठ में उठाते हैं तो पीठ पर इसका दबाव भी कम पड़ता है। यही नहीं यदि कहीं रात को जरूरत पड़े तो लोग इसे ओढ़कर आराम से सो जाते हैं। सिरमौर के लोईया को देश विदेश में पहचान हिमाचल निर्माता प्रथम मुख्यमंत्री दिवंगत डाॅ. यशवंत सिंह परमार ने दिलाई। वह अकसर सर्दियों में लोईया पहना करते थे। पच्छाद के नाणू निवासी सुंदर सिंह ठाकुर व जयप्रकाश चौहान ने बताया कि डाॅ. परमार के कार्यकाल में अधिकारी लोग भी पेंट कोट के ऊपर लोईया पहना करते थे। अब सर्दियां कम होने से इसका चलन कुछ कम हुआ है।

देश-दुनिया में हैं चंबा चप्पल पहनने के मुरीद

चंबा चप्पल - फोटो : संवाद
चमड़े पर जरी और रेशम के धागे से महीन कारीगरी से तैयार चंबा चप्पल का डंका देश-विदेश में बजता है। चंबा चप्पल का इतिहास 500 साल पुराना बताया जाता है। जनश्रुति के अनुसार 16वीं शताब्दी में चंबा के राजा की पत्नी के दहेज में कारीगर चंबा लाए गए थे। ये कारीगर राज परिवार के लोगों के लिए चंबा चप्पल बनाते थे।

समय के साथ-साथ कारीगर चंबा चप्पल लोगों के लिए भी बनाने और बेचने लगे। चंबा चप्पल के संरक्षण के लिए सरकार ने इसकी जीआई टैगिंग हासिल कर ली है। अब यह ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध है। लुप्त हो रही इस कला को बचाने के लिए आज भी लगभग 50 कारीगर प्रयासरत हैं।

कुल्लू शॉल ने बनाई अनूठी पहचान 

कुल्लू शॉल ने बनाई अनूठी पहचान - फोटो : संवाद
कुल्लू शॉल ने देश-विदेश में अपनी अनूठी पहचान बनाई है। आधुनिकता के दौर में अब कुल्लू शॉल अपने आकर्षक डिजाइनों और पैटर्न के लिए भी जानी जाती है। जिला कुल्लू में हथकरघा उद्योग से करीब 10,000 लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। अकेले भुट्टिको संस्थान में करीब 1200 लोगों को रोजगार मिल रहा है और सहकार के क्षेत्र में भुट्टिको का सालाना कारोबार करीब 15 करोड़ के आसपास है। भुट्टिको के महाप्रबंधक रमेश ठाकुर के अनुसार कुल्लू का शॉल अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों तक निर्यात हो रहा है। पशमीना, अंगोरा व ऊन की डिजाइन वाली शॉल को एक कुशल बुनकर तीन दिन में तैयार करता है। 

चंबा रुमाल की शानदार कशीदाकारी

चंबा रुमाल - फोटो : अमर उजाला
चंबा रुमाल अपनी अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के लिए जाना जाता है। चंबा रुमाल की कारीगरी मलमल, सिल्क और कॉटन के कपड़ों पर की जाती है। श्री कृष्णलीला को बहुत ही सुंदर ढंग से रुमाल के ऊपर दोनों तरफ कढ़ाई करके उकेरा जाता है। महाभारत युद्ध, गीत गोविंद से लेकर कई मनमोहक दृश्यों को इसमें बड़ी संजीदगी के साथ बनाया जाता है। रुमाल बनाने में दो सप्ताह से दो महीने का समय लग जाता है। कीमत अधिक होने के कारण चंबा रुमाल को बेचना मुश्किल होता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे खरीदना आसान नहीं होता है। चंबा आकर खरीदना या फिर मंगवाना पड़ता है। ब्रिटिश अधिकारियों व पड़ोसी रियासतों के राजाओं को रुमाल उपहार के रूप में दिया जाता था। जर्मन व इंग्लैंड संग्रहालयों में भी चंबा रुमाल मौजूद है।

चंबा रुमाल का इतिहास
18वीं सदी में चंबा रुमाल तैयार करने का काम अधिक था। राजा उमेद सिंह (1748-64) ने कारीगरों को प्रोत्साहन दिया था। 1911 में दिल्ली दरबार में चंबा के राजा भूरी सिंह ने ब्रिटेन के राजा को चंबा रुमाल तोहफे में दिया था। 1965 में पहली बार चंबा रुमाल बनाने वाली महेश्वरी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। चंबा रुमाल का विकास राजा राज सिंह और रानी सारदा के समय सर्वाधिक हुआ। चंबा रुमाल को प्रोत्साहित करने के लिए चंबा के राजा उमेद सिंह ने रंगमहल की नींव रखी। चंबा रुमाल पर कुरुक्षेत्र युद्ध की लघु कृति जो विक्टोरिया अल्बर्ट संग्रहालय लंदन में सुरक्षित हैं। चंबा के शासक गोपाल सिंह ने 1873 ई. में ब्रिटिश सरकार को ये भेंट किया था।

पद्मश्री ललिता वकील का अहम योगदान
चंबा रुमाल को बुलंदियों में ले जाने वालों में पद्श्री ललिता वकील का योगदान अहम है। उन्होंने इसके लिए अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष खपा दिए। ललिता वकील को 1993 में राष्ट्रीय पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के हाथों मिला था। 2012 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शिल्प गुरु सम्मान से सम्मानित किया। ये सम्मान पाने वाली ललिता वकील इकलौती हिमाचली हस्तशिल्पी हैं। 2017 में अंतर्राष्ट्रीय क्राफ्ट अवार्ड से महिला गुरु के तौर पर मिला। 2018 में नारी शक्ति नवाजा गया है। देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देकर सम्मानित किया।खादी कॉटन के कपड़े पर रेशमी, सिल्क और नेचुरल कॉर्टन के धागे से अद्भुत कला को उकेरने में माहिर हरिपुर के सिद्घपुरा निवासी शिल्पी मस्तो देवी भी चंबा के हस्तशिल्प की हस्ताक्षर हैं।

मुगलों और लोक चित्रकारों के संयुक्त काम से निकली कांगड़ा चित्रकला 

कांगड़ा चित्रकला - फोटो : संवाद
जम्मू से लेकर गढ़वाल तक फैली हुई पहाड़ी रियासतों में उत्पन्न हुई लोक कला और मुगल कला के मिश्रण से तैयार हुई कला को ही पहाड़ी चित्रकला के नाम से जाना जाता है। इस पहाड़ी चित्रकला के अंतर्गत गुलेर, कांगड़ा, नूरपुर, बसौली, चंबा आदि शैलियां आती हैं। 18वीं शताब्दी में कांगड़ा चित्रकला शैली का जन्म कांगड़ा के गुलेर में हुआ था।

कांगड़ा चित्रकला के विशेषज्ञ धनीराम खुशदिल ने कहा कि मुगल चित्रकला शैली के कलाकार कश्मीर के परिवार को राजा दलीप सिंह ने अपने राज्य गुलेर (1695-1741) में शरण दी और गुलेर चित्रकला विकसित होना शुरू हुई। इसके बाद गुलेर के राजा गोवर्धन चंद के समय में और आगे बढ़ी।  बाद में कांगड़ा के शासक महाराजा संसार चंद कटोच के शासनकाल (1740 से 1823) में इस शैली का स्वर्णयुग था और यह शैली शीर्ष तक पहुंची। 

पवित्रता का प्रतीक कुल्लू की पूलें

पूलें - फोटो : संवाद
कुल्लू का हस्तशिल्प दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां की टोपी, शॉल, मफलर और जुराबों का हर कोई दीवाना है। कुछ समय से यहां की पारंपरिक पूलों की ओर भी लोग एकाएक आकर्षित हुए हैं। भले ही कुल्लवी पूलें दुनिया के लिए नई हैं, लेकिन यहां के ग्रामीण परिवेश में पूलें (चप्पलें) सदियों से शामिल रही हैं। हालांकि, समय के साथ इनका प्रचलन कम हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इन पूलों को काशी विश्वनाथ मंदिर में इस्तेमाल करने की सलाह दी तो लाजिमी तौर पर सबके जहन में एक सवाल उठा कि आखिर इन चप्पलों की क्या खासियत है, जिसके मुरीद खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो गए।

कुल्लू की स्थानीय बोली में इन चप्पलों को पूलें कहा जाता है। ये चप्पल आरामदेह होने के साथ-साथ पवित्र भी हैं। मंडी-कुल्लू में पूलों को भांग के रेशे के साथ-साथ जड़ी बूटियों से तैयार किया जाता है। भांग के पत्ते के तने के साथ ही ब्यूल के रेशों का भी इसे बनाने में इस्तेमाल होता है। इन्हें पवित्र माना जाता है। इन्हें पहनकर देव स्थल के भीतर जाने में कोई पाबंदी नहीं होती। इसी खासियत को जानकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल्लू की पूलों को काशी विश्वनाथ के पुजारियों, सेवादारों और सुरक्षाकर्मियों के लिए खड़ाऊ का बेहतरीन विकल्प माना। सैंज घाटी के ग्रामीण मान दास, रेवती राम के अनुसार एक पूल का जोड़ा बनाने में तीन से चार दिन का समय लग जाता है। 

धातु शिल्प का नायाब तोहफा चंबा थाल

चंबा थाल - फोटो : संवाद
देश का चंबा जिला अपनी संस्कृति और कला के लिए प्रदेश में अलग पहचान रखता है। यहां पीतल की थाल पर होने वाला मेटल वर्क और मूर्तिकला में चंबा के शिल्पियों का दूर-दूर तक कोई सानी नहीं है। चंबा में शिल्पकार थालों पर पोट्रेट, भगवान की तस्वीरों से लेकर किसी भी आम और खास इंसान की हूबहू तस्वीर उकेर देते हैं। रियासत काल के समय इन थालों पर राजाओं महाराजाओं, देवी-देवताओं सहित चंबा रुमाल से ली गई कलाकृतियां उकेरी जाती थी।

लेकिन, समय बदलने के साथ पीतल की थाल पर जानी मानी हस्तियों की तस्वीरें उकेरी जा रही हैं।एक थाल बनाने में चार से छह महीने तक लग जाते हैं। ये सारा काम हाथों से किया जाता है। इनकी कीमत आठ से लेकर 20 हजार तक होती है। चंबा थाल और मूर्तियां बना रहे 84 साल के प्रकाश चंद को उनकी शिल्पकारी के लिए 1974 में राष्ट्रपति भी सम्मानित कर चुके हैं।

देश ही नहीं विश्व पटल पर भी चंबा की अलग पहचान
चंबा रुमाल, थाल और चप्पल ने देश ही नहीं विश्व पटल पर भी चंबा जिले को अलग पहचान दिलाई है। हिमाचल के 12 बेहतरीन क्राफ्टो में ये शामिल हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि टॉप 5 में ये क्राफ्ट शामिल हैं। इतना ही नहीं, चंबा थाल और चप्पल को जीआई टैंगिंग हुई है। बीते कुछ वर्षों में चंबा के इन क्राफ्ट को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। यही, कारण है कि ओलंपिक विजेताओं, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को ये भेंट किए गए। इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, वन मंत्री राकेश पठानिया सहित अन्य नेताओं के पोट्रेट थाल पर उकेर कर भेंट किए गए हैं। चंबा के हस्तशिल्प पर दो पद्मश्री पुरस्कार भी हिमाचल के खाते में जुड़े हैं। चंबा रुमाल को संरक्षित रखने के लिए स्कूल स्तर पर छात्राओं को प्रशिक्षण मिलना चाहिए। -मनुज शर्मा, नॉर्दन मैप संस्था के संस्थापक
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घाटी की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है शॉल

सत्य प्रकाश ठाकुर, निदेशक भुट्टिको - फोटो : संवाद
कुल्लू के शॉलों की घाटी की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है। घाटी के लोगों की आय का यह एक प्रमुख स्रोत भी है। हजारों अंशकालिक या पूर्णकालिक कारीगर बुनाई करके अपना जीवनयापन कर रहे हैं। लगभग 20,000 लोग अंशकालिक काम करते हैं और लगभग 10,000 लोग पूर्णकालिक काम करके अपनी आजीविका कमाते हैं। कुल्लू घाटी के लोगों को अपनी पिछली पीढ़ियों से यह कौशल विरासत में मिला है। घाटी में बनी शॉल हथकरघा से बुने जाते हैं। इनका उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए शॉल और कपड़े की बुनाई के लिए किया जाता है। कुल्लू शॉल हिमाचल प्रदेश की विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। महंगी लागत के बावजूद आकर्षक डिजाइन, हाथ से तैयार और अन्य कई खूबियों के चलते यह लोकप्रिय हैं। इसकी कीमत डिजाइन पैटर्न, शॉल में ऊन पैटर्न की मात्रा, ऊन का प्रकार और ऊन से बने कपड़े की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

कुल्लू शॉल हथकरघा का उपयोग करके बनाए जाते हैं, लेकिन कुछ बाहरी निर्माता कॉपी किए गए डिजाइन पैटर्न के साथ कारखाने में निर्मित शॉल भारी छूट पर बेच रहे हैं। इससे मूल कुल्लू शॉल के बाजार, हिस्सेदारी और घाटी की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। रेडिमेड कारोबारियों के यह कदम दशकों से शिल्प पर काम कर रहे हैं और इस खूबसूरत कला को संजोए रखने वाले बुनकरों को हतोत्साहित कर रहा है। राज्य सरकार ने हाल ही में इन संकटों को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। सबसे बड़ा कदम कुल्लू शॉल को भौगोलिक संकेतक (जीआई) प्रदान कराना है। जीआई का उपयोग केवल उन शॉलों के लिए किया जा सकता है जो घाटी में ही उत्पादित किए गए हैं और हथकरघा का उपयोग करके बनाए गए हैं। कुल्लू शॉल के नाम से पावर लूम से बने शॉल की बिक्री को रोकने के लिए जीआई टैग अहम साबित हो रहा है। -सत्य प्रकाश ठाकुर, निदेशक भुट्टिको
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