आधुनिकता के हमलों के बावजूद यहां दिवाली मनाने की यह परंपरा सांकेतिक रूप से अभी भी जिंदा है। इसे देवनीति ने ही जीवित रखा है। राजधानी शिमला के निकटवर्ती ठियोग, चौपाल आदि क्षेत्रों में दिवाली को मनाने का ढंग पूरे देश से अलग रहता आया है। यहां दिवाली के दिन बान के ठेलों का अलाव जलाया जाता है। उसके इर्द-गिर्द नाचते हुए जागरण किया जाता है। यही नहीं, अलाव के चारों-चार घूमते हुए दिवाली का खेल होता है। इसमें दो-दो खिलाड़ियों की जोड़ियां बनती हैं।
ये ‘जाहिया मेरिया हणुआ पूता, ले ला मैरिया सिये रा पता..’ जैसे रामायण से जुडे़ वीर रस के गायन को करते हैं। पीछे वाली जोड़ियां सामने वाली जोड़ी पर पीठ की ओर से हमला करते हुए उसे जमीन पर गिराने का प्रयास करती हैं। वहीं हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में अब दिवाली पर खास तरह की कुश्ती सांकेतिक ही हो गई है। पहाड़ी रामायण गाकर महावीर हनुमान का चरित्र चित्रण करते हुए अलाव के चारों ओर अब यह खेल पहले की तरह पूरे दमखम से नहीं खेला जाता।
ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी चल रही है ये प्रथा
डोम देवता गुठाण के कारदार मदन लाल वर्मा ने कहा कि यह प्रथा अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है। हालांकि, कुश्ती अब सिंबोलिक हो गई है। बुधवार को पहले दिन को सूखी लकड़ियां इकट्ठी की जाएंगी। शाम को शुभ मुहूर्त में अलाव जलाया जाएगा। इस अलाव को स्थानीय भाषा में मटरैना कहते हैं। जब भी इसे जलाया जाता है तो गुठाण में सब ग्रामवासी एकत्रित होकर सामूहिक तौर पर एक पारंपरिक गायन करते हैं। इसे स्थानीय बोली में मुद्रा कहते हैं।
सारी रात लोग इस अलाव का जागरण करते हैं। इसके इर्द-गिर्द आतिशबाजी और पटाखे फोड़े जाते हैं। दिवाली के दूसरे दिन पहाड़ी बोली में रामायण और महाभारत का गायन होता है। इसी के साथ स्थानीय देवताओं की पूजा होती है। इस अवसर पर देवता को मानने वाले लोग भी बड़ी संख्या में गुठाण आते हैं।
साधु का स्वांग भी हो गया आधुनिक
हिमाचल प्रदेश में करियाला लोकनाटक की ठेठ परंपरागत शैली को भी लोग दिवाली पर आधुनिक रंग देने लगे हैं। इसमें साधुओं सहित कई अन्य चरित्रों का अभिनय करते हुए ग्रामीण कलाकार व्यवस्था पर तंज कसते थे।
साहित्यकार एवं पहाड़ी संस्कृति के जानकार ओम भारद्वाज ने बताया कि करियाला लोकनाटक में पहले चंद्रावली होती थी और उसके बाद बांठड़ा होता था। उसी के बाद साधु का स्वांग होता था। फिर साहब-बीबी का अभिनय होता था। सदियों से चले आ रहे करियाला में अंग्रेजी शासन पर खास कटाक्ष होता था। करियाला क्लासिक पक्ष अब गौण हो चुका है। इसमें आधुनिकता घुस आई है।