धन त्रयोदशी अनूठे संयोग के साथ आ रही है। ज्योतिषाचार्यों का दावा है कि 135 वर्षों के बाद इस वर्ष 28 अक्तूबर को धनतेरस का त्योहार अत्यंत शुभ योग के साथ आया है। ऐसे शुभ अवसर पर मां लक्ष्मी की वैदिक पूजा अतुलनीय फल की प्राप्ति देने वाली हो सकती है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन मां लक्ष्मी का विधिवत आह्वान कर भक्त मां का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं तथा उनके शुभ संयोग पूरे वर्ष अपने घर में प्राप्त कर सकते हैं। पंडित हेत राम शर्मा और पंडित घनश्याम के अनुसार इस पर्व के तीसरे दिन दीपावली का शुभ त्योहार मनाया जाता है। इसकी वस्तुत: शुरुआत धनतेरस से हो जाती है। इस बार हस्त नक्षत्र त्रयोदशी को धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है।
आमतौर पर धनतेरस को हस्त नक्षत्र नहीं आता। यह संयोग की बात है कि धनतेरस को हस्त नक्षत्र योग बन रहा है। माना जाता है कि सोने और चांदी के आभूषणों के अलावा बर्तन खरीदना इस दिन बेहद शुभ है। हस्त नक्षत्र योग, शाम सात से नौ बजे तक लक्ष्मी पूजन का सही समय है।
इसलिए आभूषणों की खरीद से जुड़ा धनतेरस
धनतेरस को आभूषणों की खरीद से जोड़ा जाता है। ज्योतिषाचार्य आचार्य कमलकांत के मुताबिक धन त्रयोदशी को सोने-चांदी के आभूषण खरीदना अति शुभ माना जाता है। क्योंकि सोना प्रभु विष्णु का प्रतीक है, जिसमें वह नित्य वास करते हैं। जहां-जहां प्रभु
विष्णु का वास होता है, वहां मां लक्ष्मी का आगमन निश्चित है। अत: सोने के आभूषणों के रूप में भक्त धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी का आह्वान करते हैं जो न केवल धन की बल्कि समृद्धि की भी सूचक हैं। खरीददारी के लिए पूरा दिन शुभ है। इस घड़ी में पूजन करने का विशेष महत्व है।
यह भी दिया जा रहा तर्क
पंडित महेश महाराज के अनुसार गत शनिवार को हुए पुष्य नक्षत्र के संयोग के साथ ही शुभ संकेत प्राप्त हो रहे हैं। इससे इस वर्ष धनतेरस पर धन की वर्षा होने वाली है। बुद्धातिया राज योग के साथ बाजार धन वर्षा करवाएगा। धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की
परंपरा है क्योंकि यह माना जाता है की चांदी चंद्रमा का प्रतीक है जो जीवन में शीतलता प्रदान करती है। मन में संतोष धन का वास होता है। इसलिए इस दिन पूजा के लिए सभी लोग भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की चांदी की बनी मूर्तियां भी खरीदते हैं। धनतेरस की शाम को घर के मुख्य द्वार पर और आंगन में दीपक जलाने की परंपरा है।
यह भी है धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्रमंथन का बीड़ा उठाया तो भगवान विष्णु ने भी उनका साथ दिया। कच्छप रूप में उन्होंने मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ का सहारा दिया था। इस समुद्रमंथन में अन्य वस्तुओं के साथ मां लक्ष्मी के बाद प्रभु धनवंतरि भी अमृत कलश के साथ पैदा हुए।
यह भी मान्यता है के कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरि का जन्म हुआ था इसलिए यह दिन धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धनवंतरि के सागर से प्रकट होने के समय उनके हाथ में अमृत कलश था इसलिए इस दिन बर्तनों की भी खरीद की जाती है। मान्यताओं के अनुसार यह दिन धन, वस्तुएं खरीदने के लिए भी शुभ होता है। इसमें खरीदी पर 13 गुना की वृद्धि होती है।