विभागीय लापरवाही के चलते हिमाचल प्रदेश में आयुर्वेदिक दवा निर्माता उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विभागीय बेरूखी के चलते प्रदेश में स्थापित लगभग 269 निजी फार्मेसी ईकाइयों में से 119 बंद हो चुकी हैं। यदि स्थानीय इकाइयों के प्रति विभाग का यही रवैया रहा तो बाकि की इकाइयां भी बंद हो जाएंगी। ये आरोप हिमाचल प्रदेश आयुर्वेदिक दवा निर्माता संघ ने लगाया है।
संघ ने आरोप लगाया है कि आयुर्वेदिक दवा खरीद में स्थानीय की बजाय दूसरे प्रांतों की इकाइयों को तरजीह दी जा रही है। संघ के चेयरमैन संघ के चेयरमैन जितेंद्र सोढ़ी, महासचिव उपेन्द्र गुप्ता और उपाध्यक्ष प्रवीण शर्मा ने पत्रकार वार्ता में कहा कि राज्य में 1100 आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जबकि विभाग के पास 250 करोड़ सालाना बजट का प्रावधान होने के बावजूद केवल 5 करोड़ रुपए आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद पर खर्च किए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि 5 करोड़ में से डेढ़ करोड़ रुपए तो विभाग अपनी 3 फार्मेसियों के लिए जड़ी बूटियों की खरीद में खर्च करता है, लगभग 75 लाख रुपये में आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केंद्रों में एलोपेथिक दवाइयों की खरीद पर खर्च किए जाते हैं। जबकि सरकार द्वारा तय खरीद पॉलिसी के विपरीत एक करोड़ रुपए का दूसरे प्रांतों की फार्मेसियों को ऑर्डर किया जाता है।
ऐसे में प्रदेश की कुल बची 150 फार्मेसियों से औषधि खरीद के लिए केवल एक करोड़ 75 लाख का बजट रह जाता है जोकि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कहा कि केंद्र सरकार से आने वाले 5 करोड़ रुपए के अतिरिक्त बजट को भी दूसरे प्रांतों से दवा खरीद में खर्च किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग पॉलिसी की बजाय मनमर्जी से काम कर रहा है और माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना की जा रही है।
इसका खामियाजा स्थानीय इकाइयों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने विभाग पर एक ही टेंडर से बार बार खरीद का आरोप भी लगाया। संघ पदाधिकारियों ने सरकार से दवा खरीद में स्थानीय इकाइयों को तरजीह देने, प्रत्येक वर्ष नया टेंडर करने और दवा खरीद में 2 की बजाय 20 प्रतिशत बजट का प्रावधान करने की मांग की।