भाजपा मुख्यालय के बाहर हुए खूनी संघर्ष को टाला भी जा सकता था। शिमला की स्मार्ट पुलिस अगर समय रहते स्थिति पर नियंत्रण कर लेती तो मामला तूल नहीं पकड़ता। सूचना दिए जाने के बावजूद पुलिस देरी से पहुंची।
सूचना के बावजूद पुलिस पहले ही मौके पर क्यों नहीं पहुंची, क्यों पहले ही पर्याप्त फोर्स वहां भेजी नहीं गई, ये सब सवाल शिमला पुलिस को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। साथ ही कार्रवाई तब शुरू की जब दोनों गुटों के बीच हाथापाई और पथराव खत्म होने वाला था।
भाजपा का भी दावा है कि आरोप है कि पुलिस फोर्स अगर समय पर मौके पर पहुंच जाती तो खूनी संघर्ष नहीं होता। पुलिस ने घटना होने के बाद कार्रवाई की।
खुद की जान बचाती दिखी पुलिस
युवा कांग्रेस के चक्कर पहुंचने से पहले मौके पर सिर्फ 20 से 25 कर्मी थे। पथराव और संघर्ष होने के बाद पुलिस फोर्स मौके पर पहुंची। मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। कहीं से सडन प्रोवोकेशन होने के कारण यह मामला बिगड़ गया।
पुलिस के जवान बीच-बचाव करते रहे। कई जगह तो खुद ही जवान अपनी रक्षा के लिए भागते फिरे दिखे। सभी पक्षों की ओर से तीन एफआईआर दर्ज कर ली गई हैं। डीजीपी हिमाचल संजय कुमार का कहना है कि एसपी शिमला मामले की तहकीकात कर रहे हैं।
वहीं, एसपी शिमला डीडब्ल्यू नेगी का कहना है कि सुबह से ही बीजेपी कार्यालय के बाहर पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई थी। इनके अलावा एएसपी, डीएसपी, आईपीएस (प्रोबेशनल) सहित करीब आधा दर्जन पुलिस अफसर मौके पर थे। क्यूआरटी भी मौके पर मौजूद थी। अगर समय रहते पुलिस इस टकराव को नहीं टालती तो स्थिति कुछ और होती।
एसपी पर भी लगे हैं गंभीर आरोप
एसपी शिमला डीडब्ल्यू नेगी सीएम वीरभद्र के बेहद करीबी माने जाते हैं। शिमला में एसपी बनाने पर भी उनके उपर सवाल उठे थे। भाजपा कई बार उन्हें निशाना बना चुकी है। भाजपा का कहना है कि एसपी एकतरफा कार्रवाई करते हैं।
पुलिस को जब मालूम था कि युकां कार्यकर्ता मौके पर मारपीट कर सकते हैं तो फिर खुद पुलिस अफसर मौके पर क्यों नहीं पहुंचे। भाजपा के कई कार्यकर्ता यहां तक दावा कर रहे हैं कि एसपी ही विक्रमादित्य को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
इन्होंने एसपी शिमला को बर्खास्त करने की मांग कर दी है।