मंडी में फॉरेस्ट गार्ड का शव जंगल में पेड़ से लटका मिलने के बाद एक बार फिर वन माफिया से निपटने के सरकार और विभाग के दावों की पोल खुल गई है। हर बार वन माफिया और वन कर्मियों के बीच टकराव की घटना सामने आते ही विभाग असलहा मुहैया कराने का प्रस्ताव सरकार को भेज देता है।
विभागीय मंत्री भी विस से लेकर प्रेस वार्ताओं में वन कर्मियों को असलहों से लेस करने की बात कहते हैं, लेकिन वक्त बीतने के साथ उनकी घोषणाएं खो जाती हैं। हालात हैं कि आए दिन हमले हो रहे हैं, लेकिन वन कर्मी निहत्थे ही प्रदेश की वन संपदा को बचाने के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं।
पिछले साल ऊना के गोंदपुर जयचंद में तस्करी रोकने के दौरान वन माफिया ने वन कर्मियों पर हमला कर दिया। कई वन कर्मी घायल हुए। मामला विधानसभा तक उछला। उस समय वनमंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी ने संवेदनशील बीटों पर कर्मियों को असलहा मुहैया कराने की घोषणा तो दी, लेकिन असलहा रखने, गोली चलाने को लेकर काई प्रोटोकाल नहीं बन सका।
लिहाजा, घोषणा सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गई। निहत्थे वन कर्मी जान जोखिम में डालकर प्रदेश की वन संपदा को बचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन न तो सरकार उनकी सुरक्षा की ओर से ध्यान दे रही है और न ही उन पर हमला करने वालों पर सख्ती कर रही है।
ऊना की घटना में सरकार के एक मंत्री पर ही आरोपियों को बचाने का आरोप लगा था। आला अधिकारी कहते हैं कि संवेदनशील बीटों पर कर्मियों को असलहा मुहैया कराने के प्रक्रिया चल रही है।
लेकिन न तो अब तक विभाग के पास असलहा आवंटन से लेकर उसके रखरखाव व निगरानी को लेकर काई व्यवस्था है और न ही कोई प्रक्रिया बनी है। ऐसे में वन कर्मी निहत्थे ही प्रदेश की वन संपदा को बचाने के लिए अपनी जान गंवा रहे हैं।