भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को चिप आधारित कार्ड जारी कर दिए हैं, लेकिन उसके बाद भी एटीएम के फ्रॉड की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। लेकिन कुछ एटीएम मशीन मेग्नेटिक स्ट्रिप से ही चलती थीं जिस पर आरबीआई ने चिप के साथ साथ मेग्नेटिक स्ट्रिप भी लगा दी है। जिससे दोनों प्रकार की मशीन में कार्ड चल सके, लेकिन अब मेग्नेटिक स्ट्रिप से ही चोरी की घटनाएं बढ़ रही हैं। नालागढ़ में सामने आई हाइटेक ठगी में भी शातिरों द्वारा इसी तरह की तकनीक अपनाए जाने की बात सामने आ रही है।
पहले पुरानी मशीनों में कार्ड मशीन के अंदर चला जाता था और लेनदेन की प्रकिया पूरी होने के बाद ही निकलता था। कई बार ग्राहक जल्दी-जल्दी में कार्ड लेना भूल जाता था। बाद में एटीएम मशीन में स्वाइप की सुविधा आई। जिससे ग्राहक कार्ड को स्वाइप करके वापस ले सके। यहीं से कार्ड की क्लोनिंग का क्रम शुरू हो गया। इन मशीनों में कार्ड रीडर सामने लगा होता है। इसलिए जालसाज मशीन में कार्ड स्वाइप की जगह हुबहू यंत्र लगा देते हैं। ज्यों ही ग्राहक पैसे निकालने के लिए मशीन में कार्ड स्वाइप करता है, उसका डाटा उस यंत्र में अंकित हो जाता है और ऊपर लगे कैमरे में पिन भी कैद हो जाता है।
इस समस्या से निजात पाने के लिए 2017 से चिप आधारित डेबिट कार्ड बनने लगे जो स्वाइप करने से कापी नहीं हो सकता।
बैंकों ने कार्ड पर चिप के साथ-साथ मेग्नेटिक स्ट्रिप भी जारी रखी जो स्वाइप की मशीन पर भी चल सके। कुछ बैंकों ने अपनी मशीनों में सुधार करके चिप आधारित कार्ड रीडर लगवा दिए हैं, लेकिन कई बैंकों की एटीएम स्वाइप वाली ही हैं। अब जालसाज ऐसी एटीएम मशीनों की तलाश में रहते हैं, जिससे शिकार फांस सके। आईसीआईसीआई बैंक में अभी भी ऐसी मशीने हैं जहां मशीन में कार्ड डाल कर वापस निकालना पड़ता है। उसके बाद ही पैसे निकलते हैं। पीएनबी से सेवानिवृत्त पूर्व प्रबंधक एचआर धीमान का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक को चाहिए कि जिन बैंकों ने अभी तहत कार्ड रीडर नहीं बदले हैं, उन पर भारी जुर्माना लगाएं और ग्राहक के कार्ड की क्लोनिंग से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए वही बैंक जिम्मेवार होना चाहिए।