कांग्रेस ने राहुल गांधी की रैली से भाजपा को भीड़ से नहीं पर मुद्दों से पटकनी देने की कोशिश की है। भाजपा में मुख्यमंत्री के चेहरे पर रहस्य बना हुआ है, जबकि कांग्रेस राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लंबे समय से नेतृत्व पर बने विवाद पर विराम लगा गए।
मोदी के कद को गिरती अर्थव्यवस्था के बोझ तले दबाने की रणनीति पर कांग्रेस का प्रचार अभियान चलेगा। इतना ही नहीं राहुल के प्रदेश कांग्रेस की दो धाराओं को एक करने का दांव भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
भाजपा को घेरने के लिए राहुल के चुनावी मंत्र में नोटबंदी और जीएसटी के साइड इफेक्ट सबसे उपर हैं। भाजपा के रणनीतिकारों के सामने अब इसकी काट निकालनी की चुनौती रहेगी।
विधानसभा चुनाव प्रचार और प्रबंधन में भाजपा अभी तक कांग्रेस से आगे दिखी है, लेकिन वीरभद्र के हाथ कमान आने से स्थितियां बदल सकती हैं। पीएम मोदी ने बिलासपुर में भले केंद्रीय मंत्री नड्डा की पीठ थपथपा कर उनके सीएम की रेस में आगे ला दिया था, लेकिन राहुल ने वीरभद्र का नाम सीएम के लिए घोषित कर पलटवार किया।
भाजपा खेमेबाजी के डर से की सीएम चेहरा नहीं ला रही, जबकि कांग्रेस वीरभद्र को आगे लाकर इसे मास्टर स्ट्रोक मान रही है। राहुल ने जिस तरह गुजरात मॉडल की खामियां निकाल कर मोदी पर हमला किया, उससे साफ है कि कांग्रेस हिमाचल और गुजरात में लगभग एक ही रणनीति लेकर उतर रही है।
परिवारवाद पर रहे मौन
भाजपा का राहुल और कांग्रेस पर दूसरा बड़ा आरोप परिवारवाद का है। परिवारवाद पर राहुल ने विदेश जाकर बहस छेड़ी थी, जिसका असर चुनावी राज्य हिमाचल में भी खूब दिखा। वीरभद्र सिंह पर भाजपा ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी ने भी परिवारवाद का आरोप लगा। भाजपा अब इस मुद्दों को कांग्रेस के खिलाफ चुनावों में जमकर इस्तेमाल कर सकती है।
पंजाब मॉडल बनाम यूपी उत्तराखंड के प्रयोग
भाजपा मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं देकर यूपी और उत्तराखंड में किया चुनावी प्रयोग हिमाचल में कर रही है। जबकि कांग्रेस पंजाब के चुनावी मॉडल को लेकर हिमाचल में आगे बढ़ रही है। पंजाब में अमरिंदर सिंह की तरह हिमाचल में वीरभद्र सिंह को संपूर्ण अधिकार दिए जा रहे हैं। टिकट तय करने में भी उनकी सबसे अहम भूमिका रहेगी।
भ्रष्टाचार पर नहीं आया जवाब
राहुल ने मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। वीरभद्र को प्रदेश का लीडर घोषित कर दिया है, लेकिन मोदी के सबसे बड़े सवाल भ्रष्टाचार का जवाब नहीं दिया। मोदी ने राहुल सोनिया और वीरभद्र को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा था। पूरी कांग्रेस को मोदी ने जमानत पर बता दिया, जिसका जवाब राहुल से मिलने की उम्मीद थी। अब भाजपा वीरभद्र को दोबारा कमान सौंपने से भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाएगी।
राहुल ने कराया एहसास, बिना वीरभद्र नहीं हिमाचल कांग्रेस का गुजारा
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिर हिमाचल के तमाम कांग्रेस नेताओं को ये एहसास करवा दिया कि बिना वीरभद्र के पार्टी का गुजारा नहीं है। राहुल ने मंडी में हुई प्रदेश विधानसभा की चुनावी रैली में वीरभद्र सिंह को ही सीएम पद का अगला उम्मीदवार घोषित करने में पार्टी की भलाई समझी।
तीन दिन पहले बिलासपुर की पीएम नरेंद्र मोदी की रैली की जवाबी चुनावी जनसभा में उन्होंने इस एलान के बाद वीरभद्र विरोधी तमाम कांग्रेसी खेमों को पाटने का भी यह प्रयास किया। रैली के बाद प्रदेश के अन्य प्रमुख कांग्रेसी दिग्गजों से बात की गई तो वे राहुल और वीरभद्र की भाषा बोलते ही नजर आए।
राहुल गांधी ने मंडी की जनसभा में कहा कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह राजा नहीं फकीर हैं। हिमाचल सरकार के विकास कार्यों को गुजरात मॉडल से आगे बताते हुए राहुल ने वीरभद्र का कद बढ़ाते हुए सातवीं बार का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया।
वीरभद्र के पक्ष में राहुल ने इतना स्पष्ट एलान तो वर्ष 2012 के चुनाव के दौरान हुई रैलियों में भी नहीं किया था। इससे उन्होंने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की उन्हें पूरी तरह से फ्री हैंड देने की मांग मान ली।
राहुल जानते हैं कि मौजूदा मोदी लहर के बीच हिमाचल में कांग्रेस के लिए कोई नया प्रयोग करना खतरे से खाली नहीं है। बेशक हिमाचल में सरकार बदलने के पांच साल के ट्रेंड से राहुल अनजान नहीं हैं। इसके बावजूद अगर उन्हें कांग्रेस के किसी तरह से रिपीट होने की कोई उम्मीद है तो वह वीरभद्र में ही नजर आई है।
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के नए प्रभारी सुशील कुमार शिंदे ने भी वीरभद्र सिंह के नेतृत्व और कांग्रेस की दशा एवं दिशा के बारे में जो फीडबैक हाईकमान को दिया है, उसी की पृष्ठभूमि पर उन्होंने हिमाचल कांग्रेस के तमाम नेताओं को यह आईना दिखाया है।
संगठन की कार्यशैली को लेकर अनेक बार वीरभद्र सिंह के निशाने में रह चुके कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शनिवार को रैली के बाद कहा कि राहुल गांधी का ये फैसला स्वागत योग्य है। हिमाचल में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में ही चुनाव लड़े जाएंगे।
कांग्रेस सत्ता में आएगी तो वही अगले मुख्यमंत्री होंगे। संगठन सदा से वीरभद्र के नेतृत्व के पक्ष में रहा है। अनेक बार वीरभद्र सिंह से अलग खेमे में माने जाते रहे कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और हिमाचल सरकार के वरिष्ठ मंत्री कौल सिंह ठाकुर भी बोले - हमने अपना नेता घोषित कर दिया है।
वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव लड़ रही है। भाजपा के पास तो अभी तक दूल्हा ही नहीं है। वहां नेतृत्व का संकट खड़ा है। वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस निश्चित तौर पर मिशन रिपीट को अंजाम देगी।