धूमल को हराने के बाद आपमें अहंकार तो नहीं आ गया?
राणा- मैं अपने क्षेत्र की जनता की सेवा को समर्पित हूं। जनता ने ही मुझ पर विश्वास जताया है। मैंने एक साधारण सा सामाजिक कार्यकर्ता बनकर चुनाव लड़ा। आज भी एक साधारण कार्यकर्ता हूं। सुजानपुर की जनता की सेवा को समर्पित हूं। अहंकार की तो बात ही नहीं लेकिन धूमल को हराकर निश्चित तौर पर मेरी जिम्मेवारी जनता के प्रति बढ़ गई है।
इस जीत के बाद कांग्रेस क्या आपका प्रोफाइल बढ़ा सकती है? सुना है राहुल गांधी से आपकी मुलाकात विशेष रही?
- मैं काम करने में विश्वास रखता हूं। मैंने न तो कांग्रेस पार्टी के बडे़ नेताओं के सामने कोई मांग रखी है और न ही इस बारे में मुझसे अभी कोई विशेष बात हुई है। शिमला आए तो राहुल गांधी से भी मैं मिला हूं। उन्होंने सिर्फ मुझे जीत पर अलग से बधाई दी।
धूमल को सीएम चेहरा घोषित करने के बाद जीत को लेकर कितने आश्वस्त थे?
राणा - जब तक वे सीएम के उम्मीदवार नहीं थे तब तक मुझे एकतरफा मुकाबला लग रहा था। सीएम उम्मीदवार घोषित हुए तो मुझे लगा कि अब मुकाबला हो सकता है। मुझे डराने-धमकाने की कोशिश हुई। मैं सुजानपुर की जनता को सलाम करता हूं कि सीएम का चेहरा देने में भी भाजपा को यहां से कामयाबी नहीं मिली।
जनता मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ी रही। उन्होंने मुख्यमंत्री के चेहरे को नहीं, बल्कि एक साधारण कार्यकर्ता का साथ दिया। मैंने कभी भी किसी से उनकी जाति, धर्म और पार्टी नहीं पूछी। जो कर सकता था, करता रहा। मैं अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा को समर्पित हूं और रहूंगा। इससे ज्यादा खुद को कुछ नहीं मानता। मैं अपने एक एनजीओ सर्व कल्याणकारी संस्था के माध्यम से लोगों से लंबे समय से जुड़ा था।
क्या चुनाव से पहले भाजपा से कोई ऑफर मिला था ?
राणा - प्रयास हुआ। भाजपा की ओर से बात आई कि समझौता कर लेते हैं। मगर बीच में धूमल साहब के कुछ सलाहकार ही ऐसा नहीं चाहते थे। उनके सलाहकार ही हमेशा दिक्कत बने।
धूमल से आपके मतभेद क्या हैं?
राणा - वर्ष 2002 में मैं सबसे पहले धूमल से जुड़कर ही राजनीति में आया। भाजपा और धूमल को मजबूत करने का काम किया। 25 दिसंबर 2007 को जब धूमल सरकार बनी तो उसके दस महीने बाद मुझे मीडिया एडवाइजरी कमेटी का चेयरमैन बनाया गया तो उसके दस माह बाद जो मेरे साथ हुआ उसे कभी नहीं भूल सकता।
सत्ता का दुरुपयोग कर मेरे खिलाफ झूठा मुकदमा बनाने का प्रयास हुआ। वुडविला पैलेस वाला वो मामला सब झूठ था। मेरी भरपूर बदनामी करने की कोशिश हुई। 20 दिसंबर को इन्कवायरी के बाद डीजी विजिलेंस ने कहा कि इसमें कुछ नहीं बनता।
ये मीडिया ट्रायल ही बनकर रह गया। उस वक्त धूमल मुख्यमंत्री और गृह मंत्री थे। अगर उनके महकमे के लोग झूठा मुकदमा बना रहे थे तो इसके लिए वे भी जिम्मेवार थे। प्रकृति के खिलाफ जाएंगे तो वह भी सब देखती है।
आपके पास धूमल साहब की कुछ कमजोरियां थीं, क्या वीरभद्र ने इसलिए अपनाया?
राणा - न किसी कमजोरी को लेकर वीरभद्र सिंह ने ही कभी कुछ पूछा। न ही किसी की कमजोरियों से ही कोई ताकतवर बन सकता है। आदमी कर्म से बलवान होता है। कमजोरियों से नहीं। मैंने वर्ष 2012 में चुनाव लड़ा। निर्दलीय।
मैंने हिमाचल के इतिहास में एक निर्दलीय के रूप में रिकार्ड तोड़ जीत दर्ज की। उसके छह महीने बाद हम कांग्रेस सरकार से जुड़ गए।
मुझे हमीरपुर में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया तो मैंने इसके लिए विधायक पद ही छोड़ दिया। मुझे खुद पर विश्वास था और वीरभद्र सिंह पर तो था ही।