करीब 47 वर्षों से न्याय के लिए राजस्थान के रेत के टीलों से लेकर शिमला के पहाड़ों की खाक छानने के बावजूद न्याय से वंचित कांगड़ा जिले के 20 हजार पौंग बांध विस्थापितों को अब न्याय मिलने की पहली बार उम्मीद जगी है।
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पहली बार खुद पौंग बांध विस्थापितों का दर्द देखने और सुनने के लिए 8 जून को कांगड़ा आ रही हैं। ज्वालामुखी में दोपहर को कांगड़ा जिले के पौंग बांध विस्थापितों से मिलने के बाद वसुंधरा राजे फीडबैक लेकर सीधे शिमला चली जाएंगी।
यहां पर 9 जून को वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और सरकारी अधिकारियों से बैठक कर पौंग बांध विस्थापितों के मामले पर चर्चा कर इसका हल निकालने की कोशिश करेंगी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ राजस्थान के संबंधित अधिकारियों का दल भी होगा।
47 वर्षों में पहली बार राजस्थान का कोई सीएम विस्थापितों की बात सुनेगा
वसुंधरा राजे कांगड़ा में सुबह 8 बजे पहुंच जाएंगी। इसके बाद वे बगलामुखी, बज्रेश्वरी, चामुंडा देवी और ज्वालाजी मंदिरों में देवी दर्शन करेंगी। इसके बाद ज्वालाजी में महिला मोर्चा के साथ बैठक करेंगी।
इसमें महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष इंदु गोस्वामी भी मौजूद रहेंगी, जो वसुंधरा से हिमाचल में महिला सशक्तीकरण पर चर्चा करेंगी। भाजपा के महामंत्री कृपाल परमार ने बताया कि देहरा के पुल से वसुंधरा राजे को पौंग बांध का नजारा भी दिखाया जाएगा, जहां पहले हजारों परिवार रहते थे जो आज उजड़ चुके हैं।
परमार ने बताया कि 47 वर्षों में पहली बार राजस्थान का कोई मुख्यमंत्री कांगड़ा जिला में आकर पौंग बांध विस्थापितों की बात सुनेगा। उन्होंने मुख्यमंत्री राजे का कांगड़ा जिला का दौरा तय करने में व्यक्तिगत तौर पर काफी प्रयास किए थे।
1970 में उजड़ गए थे 20 हजार परिवार
इससे पहले वसुंधरा राजे का दो दिवसीय दौरा सिर्फ शिमला का था, लेकिन, शिमला का एक दिन का दौरा कटवाकर इसे कांगड़ा जिला में समायोजित करवाया गया। वर्ष 1970 के आसपास देहरा से लेकर नूरपुर इलाके तक पौंग बांध के नाम पर करीब 20 हजार परिवार उजड़ गए थे।
इस पूरे इलाके को तब अनाज का कटोरा नाम से जाना जाता था। इस इलाके का अनाज कांगड़ा सहित कुल्लू और लाहौल-स्पीति जिलों का पेट भरता था। लेकिन, बांध के नाम पर हजारों परिवारों को अपनी सोने जैसी जमीन और घर तथा नौकरी-पेशा छोड़ना पड़ा।
बदले में उन्हें रेगिस्तान के रेत के टीलों में मुरब्बे मिले। वे भी राजस्थान सरकार के कर्मचारियों और लोगों ने कथित रूप से हड़प लिए। इसके बाद हजारों विस्थापित परिवार न्याय के लिए राजस्थान से लेकर हिमाचल के पहाड़ों में भटक रहे हैं।