प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की उस अधिसूचना के बारे में स्पष्टीकरण मांगा है, जिसके तहत विश्वविद्यालय ने निजी बीएड कॉलेजों को ट्यूशन फीस का 10 फीसदी देने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने इसके अलावा प्रत्येक छात्र से 500 व 250 रुपये के हिसाब से डेवलपमेंट फंड लिए जाने पर भी एचपीयू को अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर व न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश बीएड कॉलेज एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किए। प्रार्थी संघ ने विश्वविद्यालय द्वारा 20 सितंबर को जारी अधिसूचना को यह कहते हुए चुनौती दी है कि विश्वविद्यालय का ट्यूशन फीस में से 10 फीसदी हिस्सा वसूलना कानूनी तौर पर गलत है।
इसके अलावा विश्वविद्यालय का कोई अधिकार नहीं बनता कि वह उनके संस्थान से बीएड करने वाले प्रत्येक छात्र से डेवलपमेंट फंड के नाम पर 500 और 250 के हिसाब से पैसे की मांग करे। याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार एचपीयू ने बीएड कॉलेजों को ईमेल के माध्यम से सूचित कर उपरोक्त लेवी चार्ज व डेवलपमेंट फंड जमा करवाने के फरमान जारी किए हैं और फीस का हिस्सा 30 नवंबर तक जमा करवाने को कहा गया है।
प्रार्थी संघ ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय बिना क्षेत्राधिकार के इस तरह की वसूली करने जा रहा है जबकि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन रेगुलेशन 2002 के मुताबिक सरकार ही ऐसा करने के लिए अधिकृत है। कानूनी मान्यता के बगैर भी विश्वविद्यालय इस तरह की वसूली नहीं कर सकता इसलिए प्रार्थी संस्था ने इस अधिसूचना को रद्द करने की गुहार लगाई है। मामले पर अगली सुनवाई 21 नवंबर को होगी।