भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (कैग) ने नगर निगम की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार नगर निगम शिमला झूठे सपने दिखाने में माहिर हो गया है। राजधानी शिमला में सुविधाएं सिर्फ फाइलों में दी जा रही हैं।
कैग की रिपोर्ट में नगर निगम की कमियों को एक-एक कर गिनाया गया है। राजधानी में जलापूर्ति, सड़कें, सीवरेज प्रणाली, ठोस कचरे का एकत्रीकरण व निपटान, नालियों की सफाई, पार्किंग भूभाग, गली की लाइटें सहित कई अन्य मूलभूत नागरिक सुविधाएं मुहैया करवाना नगर निगम शिमला का उत्तरदायित्व है।
यह जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन सिटी भी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम की योजनाओं और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर है। कैग ने राज्य सरकार को हालात सुधारने के लिए कुछ सिफारिशों पर विचार करने को कहा है।
एंबुलेंस रोड से वंचित रहे कई लोग
मार्च 2014 को 55 रोगी वाहन सड़कों में से 0.40 करोड़ मूल्य की 29 सड़कें पूर्ण की गईं। पूर्ण की गईं 29 सड़कों में से 21 को वाहनीय यातायात के लिए खोल दिया गया।
शेष आठ आंशिक पूर्ण 0.08 करोड़ मूल्य की सड़कें जून 2014 तक प्रयोग में नहीं लाई गईं। इस कारण 0.08 करोड़ रुपये का व्यय निष्फल रहा।
2002 से 2014 के दौरान स्वीकृत 0.51 करोड़ की लागत से 13 सड़कों के कार्य जून 2014 को प्रगतिरत थे। इस पर 0.42 करोड़ का व्यय किया गया। 0.09 करोड़ नगर निगम के पास जून 2014 तक अप्रयुक्त पड़े रहे।
इन 13 कार्यों की पूर्णता में 3 तथा 135 महीने के मध्य का विलंब हुआ। 0.42 करोड़ रुपये का व्यय निष्फल रहा। लोगों को इच्छित लाभों से भी वंचित रहना पड़ा।
25 लीटर कम पानी, सप्लाई भी सवा घंटा
मानकों के अनुसार उपभोक्ताओं को 135 लीटर पानी की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आपूर्ति की जानी थी लेकिन नगर निगम ने 2009 से 2014 के दौरान 110 लीटर पानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आपूर्ति की। उपभोक्ताओं को 25 लीटर कम पानी की सप्लाई हुई है।
निष्पादन सूचकों के अनुसार पानी की आपूर्ति 24 घंटे करना अपेक्षित था, लेकिन नगर निगम प्रतिदिन केवल 1.20 घंटे पानी की आपूर्ति कर रहा है। पानी की शुद्धता की जांच जिस एजेंसी से पानी प्राप्त किया जा रहा है, उसके अतिरिक्त किसी स्वतंत्र एजेंसी नहीं करवाई जा रही।
पार्किंग निर्माण की योजनाएं स्पष्ट नहीं
रिपोर्ट का कहना है कि निगम परिधि में बिना पार्किंग स्थल के रहने वाले लोगों की ओर से पंजीकृत करवाए गए वाहनों और प्रतिदिन शिमला में प्रवेश करने वाले पर्यटक वाहनों की संख्या का ब्योरा नगर निगम के पास नहीं है। शहर में पार्किंग बनाने की आवश्यकताओं का पता लगाने और योजनाएं बनाने की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है।
नहीं बनी वार्ड समितियां
2009 से 2014 के दौरान प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1994 के प्रावधानों के अनुसार वार्ड सभाओं/ वार्ड समितियों का गठन नहीं किया गया है। पर्याप्त सहभागिता न होने से नगर निगम की योजना प्रक्रिया बाधित हुई है। नगर निगम द्वारा वार्षिक कार्य योजनाएं तथा नगर विकास योजना तैयार नहीं की गई थी।
अवैध निर्माण के 73 प्रतिशत मामले लंबित
2009 से 2014 के दौरान निगम ने अवैध निर्माण के 667 मामले देखे। नोटिस देने के बाद 183 मामलों में 3.29 लाख रुपये की वसूली की गई। मार्च 2014 तक नगर निगम के पास 484 मामले लंबित पड़े हैं।
कुल मामलों का यह 73 प्रतिशत है। अवैध निर्माण के मामले पकड़ने को निगम ने उड़नदस्ता नहीं बनाया। इसके अलावा निगम की संपत्तियों की किराए वसूली प्रक्रिया पर भी ध्यान नहीं दिया गया।
ठोस कचरा नियमावली का उल्लंघन
नगर निगम ने जून 2014 तक अक्रियाशील डंपरों को नए में बदलने की कार्रवाई आरंभ नहीं की। नगर निगम द्वारा 12 हस्तचलित डंपरों को विभिन्न स्थलों पर कूड़े के भंडारण के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। यह नगर ठोस कचरा नियमावली 2000 के प्रावधानों का उल्लंघन है।
लेटलतीफी से लैप्स हो गया बजट
नगर निगम को आनलाइन करने के लिए बनाए गए ई गवर्नेंस प्रोजेक्ट को समय से शुरू नहीं करने के चलते केंद्र सरकार से मिलने वाली 10.57 करोड़ की राशि प्राप्त करने में निगम प्रशासन विफल रहा।
शहर की जनता एक बड़ी सुविधा प्राप्त करने से महरूम हो गई। उधर, शहरी गरीबों के लिए बनाए जाने वाले आशियाना वन और आशियाना टू प्रोजेक्ट के पूर्ण न होने के कारण वित्त पोषक अभिकरणों से देय 13 करोड़ से नगर निगम वंचित रह गया।
1447 दिन तक लंबित रहीं शिकायतें
जून 2010 के दौरान नगर निगम शिमला में ई समाधान प्रणाली क्रियाशील की गई। साल 2010 में उपभोक्ताओं ने ई समाधान
पोर्टल से निगम में 1201 शिकायतें दर्ज करवाईं। जुलाई 2014 तक 1009 शिकायतों का निपटारा किया गया।
192 शिकायतें लंबित रही। शिकायतें निगम की विभिन्न शाखाओं में 7 से 1447 दिनों की अवधि तक लंबित रहीं। शिकायतों का निपटारा नागरिक चार्टर में निर्धारित 24 घंटों की समय सीमा के अनुसार नहीं किया गया।