इस पर अदालत ने पंजाब को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसे न्यायालय के आदेशों का पालन करना चाहिए और अपना स्पष्ट रुख दो सप्ताह के भीतर बताना होगा। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी। जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले के बाद बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल को 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सा मिलना शुरू हो गया था, लेकिन 1966 से लेकर 2011 तक की अवधि का बकाया अभी तक नहीं मिला है। यह बकाया करीब 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर है। केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि पंजाब और हरियाणा यह बकाया राशि नकद देने के बजाय बिजली के रूप में चुकाएं।
प्रस्ताव के तहत 13,066 मिलियन यूनिट में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल को देने की व्यवस्था की जा सकती है। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद बीबीएमबी परियोजनाओं में हिस्सेदारी को लेकर राज्यों के बीच विवाद बना रहा। समाधान नहीं निकलने पर हिमाचल प्रदेश ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया था। इसके बाद 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए हिमाचल का हिस्सा 7.19 प्रतिशत तय किया था। फैसले के अनुसार पंजाब का हिस्सा 51.80 प्रतिशत, हरियाणा का 37.51 प्रतिशत, चंडीगढ़ का 3.50 प्रतिशत और राजस्थान की हिस्सेदारी यथावत रखी गई थी।