अवैध निर्माण को वैध कर नियमित करने के प्रस्तावित कानून को हिमाचल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने असंवैधानिक करार दिया है। यह बिल विधानसभा के मानसून सत्र से पास हो चुका है। अंतिम मंजूरी के लिए राजभवन जाएगा। अब देखना है कि राजभवन इस अंधे कानून पर मुहर लगाता है या हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए इसे बिना मंजूरी लौटा देता है।
कोई भी विधेयक उस वक्त तक कानून नहीं बन सकता, जब तक राज्यपाल उसे अनुमति नहीं देते। यानी अब राजभवन को अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। हाईकोर्ट में बीते मंगलवार को न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति सुरेश्वर ठाकुर की खंडपीठ ने प्रस्तावित कानून को असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि अवैध निर्माण इस तरह नियमित नहीं किए जा सकते।
यह प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। पहले सरकारी मशीनरी अवैध निर्माण रोकने में नाकाम रही और अब अपनी नाकामी छिपाने के लिए अवैध निर्माण को नियमित करने जा रही है। कायदे से सरकार के इस तरह के विवादास्पद फैसले का विधानसभा में विरोध होना चाहिए था। लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा ने भी इसका विरोध नहीं किया।
एक घंटे से भी कम चर्चा में हिमाचल प्रदेश नगर और ग्राम योजना संशोधन विधेयक 2016 पास हो गया। अगले कुछ दिन में यह विधेयक राज्यपाल की अंतिम मंजूरी के लिए राजभवन भेजा जाएगा। राज्यपाल अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर इस पर अनुमति देने से इनकार कर सकते हैं या पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं।
कुछ नहीं तो निषेधाधिकार का प्रयोग कर खेल विधेयक की तरह इसे अपने पास रोक सकते हैं। क्योंकि संविधान में राज्यपाल कोई भी बिल वापस करने के लिए बाध्य नहीं हैं। खेल विधेयक का तो फिर सीधा आम जनता से कोई लेना-देना नहीं है। खेल विधेयक हिमाचल में एक राजनीतिक मुद्दा है। सूबे के दो बड़े राजनीतिक घरानों के बीच प्रतिष्ठा की जंग है।
लेकिन अवैध निर्माण को वैधता देना कानून का पालन करने वाले उन लाखों शहरियों की भावनाओं से जुड़ा है, जिन्होंने नियम-कानून का पालन कर अपना घर बनवाया। जैसा कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईमानदार शहरी हाशिए पर रह जाएगा जबकि अवैध काम करने वाले लोगों का मनोबल और बढ़ेगा। ये ईमानदार नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन है।
इस मुद्दे पर राजभवन का कोई भी फैसला राज्यपाल के विवेक पर निर्भर है। नियम कानून तोड़ने वालों को राहत देने का कोई भी कानून संवैधानिक रूप से उचित नहीं। इससे सिर्फ भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलेगा। विधेयक राजभवन जाने से ठीक पहले अगर
हाईकोर्ट ने खुद उसे असंवैधानिक ठहरा दिया हो तो मामला ज्यादा गंभीर हो जाता है। ऐसे में संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल अपने क्षेत्र के निषेधाधिकार का प्रयोग कर जनहित में किसी भी विधेयक को कानून बनाने से रोक सकते हैं।