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Himachal: केसीसी बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी समेत अन्य को अग्रिम जमानत, जानें कोर्ट के बड़े फैसले

Fri, 15 May 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक से जुड़े करोड़ों रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी युद्ध चंद बैंस और अन्य सह आरोपियों को अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक से जुड़े करोड़ों रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी युद्ध चंद बैंस और अन्य सह आरोपियों को अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया है। न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली और आरोपों की प्रकृति पर कई सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला बैंक ऋण के पुनर्भुगतान में विफलता का लगता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऋण वसूली के लिए दीवानी अदालतों और सरफेसी अधिनियम का सहारा लिया जाना चाहिए, न कि गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसा वसूलने के लिए आपराधिक अदालतों का।

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अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई

अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि पुलिस ने उन बैंक निदेशकों को गिरफ्तार नहीं किया, जिन्होंने ऋण मंजूर किया था, जबकि मुख्य आरोपी की हिरासत की मांग की जा रही थी। कोर्ट ने कहा कि जब ऋण मंजूर करने वाले अधिकारी बाहर हैं, तो केवल ऋण लेने वाले को हिरासत में रखना तर्कसंगत नहीं है। कोर्ट ने नोट किया कि पुलिस ने केस डायरी तो पेश की, लेकिन जब्त किए गए मुख्य दस्तावेजों को अदालत के समक्ष नहीं रखा। साथ ही यह भी पाया गया कि अधिकांश ऋण राशि कथित जाली सर्टिफिकेट की तारीख से पहले ही वितरित कर दी गई थी, जिससे धोखाधड़ी के आधार पर संदेह उत्पन्न हुआ।

आरोपियों के अधिवक्ताओं ने दिया ये तर्क

आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि यह केवल एक लोन डिफॉल्ट का मामला है, जिसे राजनीतिक या अन्य कारणों से आपराधिक रंग दिया गया है। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद आरोपी युद्ध चंद बैंस, हरीश चंद, सतवीर मिन्हास और अशोक कुमार पुरी की अग्रिम जमानत याचिकाओं को मंजूर कर लिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत के निपटारे तक सीमित हैं और मामले के मुख्य ट्रायल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। आरोप है कि बैंक के निदेशक मंडल ने आरबीआई और नाबार्ड के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए बिना उचित वेरिफिकेशन के ऋण मंजूर किया।

90 दिनों के भीतर समीक्षा न होने पर वरिष्ठ डॉक्टर का निलंबन रद्द

वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा कानून के तहत 90 दिनों के भीतर समीक्षा न होने पर एक सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर के निलंबन को अवैध घोषित कर दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के निलंबन की समीक्षा निर्धारित 90 दिनों के भीतर नहीं की जाती, तो वह निलंबन स्वतः ही अमान्य हो जाता है। अदालत ने कहा कि बिना चार्जशीट या बिना समीक्षा के निलंबन को अनिश्चितकाल तक नहीं खींचा जा सकता। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को निलंबन अवधि के सभी परिणामी लाभ देने के भी निर्देश दिए हैं। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला में सीनियर रेजिडेंट के पद पर तैनात डाॅक्टर को 6 अक्तूबर 2025 को एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था। नियमानुसार, 48 घंटे से अधिक हिरासत में रहने के कारण डीम्ड सस्पेंशन पर रखा गया था।

डॉक्टर को 20 दिसंबर 2025 को जमानत मिली

डॉक्टर को 20 दिसंबर 2025 को जमानत मिली और उन्होंने 22 दिसंबर 2025 को विभाग में उपस्थिति दर्ज कराई। याचिका में तर्क दिया कि सीसीएस (सीसीए) नियमों के नियम 10(6) और 10(7) के अनुसार किसी भी निलंबन आदेश की समीक्षा 90 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता के मामले में यह अवधि मार्च 2026 में समाप्त हो गई थी, लेकिन विभाग ने समय पर कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रशासनिक व्यस्तताओं और विधानसभा सत्र के कारण समीक्षा समिति की बैठक समय पर नहीं हो सकी। विभाग ने देरी से 7 अप्रैल 2026 को बैठक कर निलंबन को अगले 90 दिनों के लिए बढ़ा दिया था। अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कानून की प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। नियम 10(7) स्पष्ट करता है कि यदि 90 दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले विस्तार का आदेश पारित नहीं किया जाता, तो निलंबन प्रभावी नहीं रहता। जो आदेश समय सीमा बीतने के कारण पहले ही अमान्य हो चुका है, उसे बाद में समीक्षा करके पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

कपल केस कर्मचारी कितनी बार ले सकते हैं लाभ, नीति बनाए सरकार

 प्रदेश हाईकोर्ट ने तबादला नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि सरकारी सेवाओं में कपल केस (पति-पत्नी का एक साथ होना) की सुविधा प्रशासनिक आवश्यकताओं से ऊपर नहीं हो सकती। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि एक ऐसी नीति तैयार करे जिसमें यह स्पष्ट हो कि कपल केस के आधार पर किसी कर्मचारी को उसके पूरे सेवाकाल में कुल कितनी बार रियायत दी जा सकती है। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि विभाग की प्रशासनिक अनिवार्यताओं को उन दंपतियों की जरूरतों के अधीन नहीं रखा जा सकता, जिनमें दोनों सरकारी नौकरी में हैं। हर बार तबादले के समय ऐसी रियायत की उम्मीद करना सही नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए तबादला आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है।

यह है मामला

राजकीय महाविद्यालय बासा (मंडी) में कार्यरत संगीत शिक्षक ने अपने तबादले को चुनौती दी थी। उनका स्थानांतरण सुजानपुर (हमीरपुर) किया गया था। याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें थी कि उनका तबादला केवल किसी अन्य व्यक्ति को एडजस्ट करने के लिए किया गया है। उनका मामला सरकार की कपल केस नीति के दायरे में आता है। राज्य में पंचायती राज चुनावों के कारण आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू है, ऐसे में तबादला गलत है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 2022 से अपने वर्तमान स्टेशन पर तैनात हैं और उन्होंने अपना सामान्य कार्यकाल (4 वर्ष) पूरा कर लिया है। अदालत ने कहा कि जब कार्यकाल पूरा हो चुका हो, तो तबादले को केवल किसी को लाभ पहुंचाने वाला नहीं माना जा सकता। वहीं चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि यह तबादला अनुमति लेकर किया गया है।

नामांकन रद्द होने के खिलाफ दायर याचिका हाईकोर्ट से ली वापस

 प्रदेश हाईकोर्ट ने हमीरपुर जिले के वार्ड नंबर 11 (महल) से जिला परिषद सदस्य पद के लिए नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को याचिकाकर्ता ने वापस ले लिया है। याचिकाकर्ता अंजू कुमारी ने 13 मई को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनका नामांकन पत्र रद्द कर दिया गया था। उन्होंने अदालत से गुहार लगाई थी कि इस आदेश को निरस्त कर उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाए। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने मामले में सुनवाई की। अदालत ने लंबी बहस के बाद कानूनी पहलू को लेकर याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से इस याचिका को वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें उचित समय पर कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का लाभ उठाने की छूट दी जाए। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता प्रदान करते हुए याचिका को वापस लिया गया मानकर खारिज कर दिया है।

हिमाचल में वाणिज्यिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र का पुनर्गठन

वहीं प्रदेश सरकार ने राज्य में वाणिज्यिक अदालतों (कमर्शियल कोर्ट) अधिकार क्षेत्र को लेकर नई अधिसूचना जारी की है। गृह विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार पूर्व में 18 अगस्त 2025 को जारी अधिसूचना को निरस्त करते हुए वाणिज्यिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र का पुनर्गठन किया गया है। यह निर्णय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद लिया गया है। नई व्यवस्था के तहत सिविल जज न्यायालय तीन लाख रुपये से लेकर 30 लाख रुपये तक के वाणिज्यिक विवादों के मामलों की सुनवाई करेगा। वरिष्ठ सिविल जज न्यायालय 30 लाख रुपये से अधिक तथा 60 लाख रुपये तक के मामलों की सुनवाई करेगा। इसके अलावा जिला एवं अतिरिक्त जिला न्यायाधीश न्यायालय को 60 लाख रुपये से अधिक तथा एक करोड़ रुपये तक के वाणिज्यिक विवादों के मामलों की सुनवाई करेगा। यह अधिसूचना अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) कमलेश कुमार पंत ने जारी की है।
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प्रतिबंधित सड़कों के पास पर हाईकोर्ट ने सरकार से तलब किया रिकॉर्ड

 प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह शिमला रोड यूजर्स एंड पेडेस्ट्रियन एक्ट 2007 की धारा 4 के तहत जारी किए पासों का पूरा विवरण रिकॉर्ड के साथ पेश करें। विशेष रूप से शैलेडे स्कूल, शिल्ली चौक से छोटा शिमला के बीच के प्रतिबंधित मार्ग के लिए जारी किए पासों की संख्या और प्रक्रिया की जांच की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने शिमला के सेंट माइकल कैथेड्रल और सेंट थॉमस स्कूल के समीप सड़क से लोहे के पोल हटाने और पार्किंग परमिट बहाल करने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चों और पैदल चलने वालों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि सड़क पर लोहे के खंभे लगाने से एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपातकालीन सेवाओं का रास्ता रुक गया है, जिससे स्थानीय निवासियों की जान को खतरा हो सकता है। हालांकि अदालत ने नगर निगम के उस जवाब को स्वीकार किया जिसमें कहा गया कि एंबुलेंस के लिए रिपन अस्पताल और विंटर फील्ड के माध्यम से वैकल्पिक रास्ते खुले हैं, इसलिए जानमाल का कोई खतरा नहीं है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि सेंट माइकल कैथेड्रल के पास लोग लगातार अवैध रूप से बाइक खड़ी कर रहे थे। चालान कटने के बावजूद यह सिलसिला नहीं रुका जिससे स्कूल जाने वाले बच्चों और बुजुर्गों के लिए पैदल चलना मुश्किल हो गया था। इस समस्या के समाधान के लिए पुलिस अधीक्षक शिमला के अनुरोध पर यह लोहे के पोल लगाए थे। कोर्ट ने कहा कि नगर निगम की ओर से सेंट माइकल कैथेड्रल के नीचे वाल की मरम्मत के दौरान सेंट थॉमस स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना एक सराहनीय कार्य है।
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