यह खरपतवार सामान्यतया धान के साथ उगता है। फसल तैयार होने से पहले ही यह खेतों में झड़ जाता है, जिससे साल दर साल इसके बीज बढ़ रहे हैं। इसे अनुपयोगी मानते हुए कभी इस पर अनुसंधान नहीं किया गया, जबकि धान में लगने वाली बीमारियों के प्रति इसमें प्रतिरोधी क्षमता बहुत ज्यादा है। खेत में खाद न भी डाली जाए, फिर भी यह खरपतवार बहुतायत में पैदा होता है। इसमें विभिन्न पोषक तत्वों के अलावा एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और मिनरल्स अधिक मात्रा में मौजूद हैं, इसलिए इसके आनुवांशिक आधार के इस्तेमाल से धान की नई उन्नत किस्में तैयार की जा सकती हैं।
धान में लगने वाली बीमारियों के प्रति भी इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है। आईसीएआर फार्म विज्ञान केंद्र मणिपुर, आईसीएआर अनुसंधान परिसर त्रिपुरा, उद्यान कॉलेज सिक्किम, दिल्ली विवि, केंद्रीय विवि पंजाब और मोहनलाल सुखाड़िया विवि उदयपुर राजस्थान के अलावा सीपीआरआई शिमला सहित अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से शोध पत्र तैयार किया है।
धान के साथ उगने वाले खरपतवार वीडी राइस में रोगों और कीटों से लड़ने की क्षमता अधिक पाई गई है। इसके जेनेटिक बेस का प्रयोग कर धान की नई उन्नत किस्मों से उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। गहरी जड़ों के चलते यह गहराई से जिंक निकालने में भी सक्षम है, जिससे चावल में जिंक की कमी दूर की जा सकती है।- डाॅ. अनिल कुमार चौधरी, प्रधान वैज्ञानिक, फसल उत्पादन प्रभाग, सीपीआरआई, शिमला