वित्त विभाग के कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी करुणामूलक नियुक्ति के मामले पर पहले ही निर्णय लिया जा चुका है या उसे अस्वीकृत किया जा चुका है, तो उसे दोबारा विचार के लिए प्रस्तुत करना उचित नहीं है। ऐसे मामलों को दोबारा भेजना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि इससे प्रशासनिक पत्राचार बढ़ता है, कार्यों की पुनरावृत्ति होती है और वास्तविक पात्र मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी होती है। शिक्षा निदेशक ने सभी जिला एवं संस्थान स्तर के अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे प्रत्येक प्रस्ताव की अपने स्तर पर गहन जांच और परीक्षण करें। नियमों के अनुरूप पाए जाने वाले मामलों को ही निदेशालय को भेजा जाए। निदेशक ने चेताया कि यदि भविष्य में बिना जांच-परख या नियमों के विपरीत प्रस्ताव भेजे गए तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।