कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल ने कहा कि न्याय और जजमेंट में भारी अंतर होता है। जो जजमेंट है, जरूरी नहीं वह न्याय हो। उन्होंने कहा कि वे फाइलों से नहीं, मानव जीवन के साथ डील करते हैं। न्याय वही है, जो सामाजिक हो।
उन्होंने कहा, बार एसोसिएशन की भी न्याय में उतनी ही अधिक जिम्मेवारी है, जितनी एक न्यायाधीश की होती है। जस्टिस करोल बिलासपुर में बार रूप में अधिवक्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अधिवक्ताओं से आह्वान किया अपने सीखने की भूख को खत्म न होने दें।
जहां सीखने की भूख खत्म हो जाती है, वहां तरक्की रुक जाती है। कहा कि भारतीय संविधान में न्यायपालिका को लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ माना गया है। यह तीसरा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के बीच आपसी तालमेल और संबंध बेहतर हों।
उन्होंने कहा हिंदुस्तान का सम्मान, संविधान का सम्मान सबका मुख्य धर्म है। इस पर कोई प्रश्न या कोई बहस नहीं होनी चाहिए। ईश्वर हर व्यक्ति को जीवन में कुछ न कुछ कार्य देता है। ऐसे ही किसी को अधिवक्ता के रूप में किसी को न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अवसर मिलता है।
आवश्यकता इस बात की है कि सभी ईश्वर की ओर से दिए गए अपने कार्य को पूरी ईमानदारी वह जनता के प्रति जवाबदेही के रूप में करें। न्याय को स्थापित करने में अधिवक्ताओं का भी उतना ही बड़ा रोल है, जितना एक जज का। यदि अधिवक्ता अपने केस पर अच्छी मेहनत करेंगे, तभी जज सही और सटीक फैसला सुना सकता है।