शिमला। क्लीन सिटी शिमला में 11 दिन तक चली सफाई कर्मियों की हड़ताल और अब अचानक 20 फीसदी वेतन बढ़ाने को लेकर निगम प्रशासन और मेयर-डिप्टी मेयर निशाने पर आ गए हैं। सफाई कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने का फैसला एजीएम और नगर निगम हाउस की नामंजूरी के बावजूद लिया गया। वीरवार देर शाम जब कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने के लिए बैठक बुलाई गई तो निगम के कई अधिकारियों ने सूचना मिलने के बावजूद इस बैठक से दूरी बनाए रखी। वजह साफ थी कि जिस प्रस्ताव को एजीएम और निगम हाउस पहले ही नकार चुका है, उस पर अब चंद अफसर और मेयर-डिप्टी मेयर कैसे फैसला ले सकते हैं। यही नहीं, हड़ताल के पहले दिन से निगम प्रशासन 20 फीसदी वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव को यह कहकर टालता रहा कि एजीएम ही इसे मंजूरी दे सकती है। लेकिन जब एजीएम ने भी इस प्रस्ताव को नकार दिया तो अचानक प्रशासन ने खुद फैसला ले लिया। सवाल उठता है कि जब प्रशासन कर्मचारियों की मांग अपने स्तर पर पूरा कर सकता था तो फिर एजीएम बुलाने और बैठकें करने का ड्रामा क्यों किया गया? जनता 11 दिन खुद कूड़ा उठाने को मजबूर हुई, शहर के जंगल और नाले कूड़े से भर गए, इसके लिए कौन जिम्मेदार है। उधर, मेयर कुसुम सदरेट ने कहा कि निगम के पास खुद इतना फंड नहीं है कि इनकी 20 फीसदी सैलरी बढ़ा देते।
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क्या यही विरासत लाना चाहती थी भाजपा
माकपा पार्षद शैली शर्मा ने कहा कि निगम हाउस में भाजपा पार्षद और मेयर-डिप्टी मेयर शहर की पुरानी विरासत लौटाने की बात कहकर पिछले निगम का मजाक उड़ाते थे। पूछा कि क्या खूबसूरत शिमला को गंदा करना ही उनका विरासत लौटाना है। शैली ने कहा कि सदन में उन्होंने सैलरी बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था लेकिन मेयर नहीं मानीं।
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ये थे शिमला के लिए भाजपा के अच्छे दिन
कांग्रेस पार्षद अर्चना धवन ने कहा कि सैलरी बढ़ाना अच्छा फैसला है। लेकिन यह पहले क्यों नहीं लिया गया। दो बार एजीएम क्यों बुलाई जब निगम खुद फैसला ले सकता था। खूबसूरत शिमला को दागदार किया गया। क्या भाजपा ऐसे ही अच्छे दिन लाने वाली थी।
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