बलद्वाड़ा में धानों का राजा कहलाने वाली पाकिस्तान की लायलपुरी बासमती अब शायद किताबों में ही पढ़ने को मिलेगी। इसे उगाने से अब किसान तौबा करने लगे हैं। किसानों का कहना है कि धान की यह प्रजाति पहले यहां पर बहुत अच्छी तरह से उगती थी और इसकी भारी पैदावार होती थी, लेकिन समय के साथ अब यह धान बहुत कम मात्रा में पैदा हो रहा है। इसके कारण लोगों को इससे नाममात्र ही फसल मिल रही है। इसकी खेती के लिए किसानों को रात दिन मेहनत करनी पड़ती है। किसानों ने इस खेती से मुंह मोड़ने का सबसे बड़ा कारण यह बताया कि इस धान को हर क्षण पानी चाहिए। जबकि कई सालों से बारिश या तो बेहिसाब हो रही है या तो फिर नाममात्र की होती है। लायलपुरी बासमती की खेती के लिए मशहूर बलद्वाड़ा क्षेत्र के नवाणी और कटोह पंचायत के किसानों ने भी अब इस खेती को छोड़ दिया है। इससे लग रहा है कि इस धान का यहां पर अस्तित्व खतरे में है। अब सिर्फ इक्का-दुक्का किसान ही इस खेती को कर रहे हैं। इन पंचायतों में पैदा होने वाले धान की मांग प्रदेश और देश में अधिक रहती है। सबसे पहले मंडी, सुकेत और बिलासपुर के राजघरानों में इस धान की खेती होती थी। उधर, जब कृषि विभाग सरकाघाट के एसएमएस संतराम संत ने बताया कि इसका बीज काफी पुरानी तकनीक का है। इसलिए किसान स्वयं ही इसकी देखभाल करके बेहतर फसल ले सकते हैं।
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150 रुपये प्रति किलो बिकती है लायलपुरी बासमती
धान की इस प्रजाति की खेती कम होने के कारण इसके दाम बहुत महंगे होते हैं। अमूमन इसके दाम 120 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम होते हैं। मई माह में किसान इसकी पनीरी देते हैं जो करीब 20 दिनों में तैयार हो जाती है। जुलाई माह मेें इसकी रोपाई की जाती है। इसके पौधों को हर समय पानी की जरूरत रहती है। इसमें कीटनाशक और खरपतवार दवाइयां छिड़कने से यह सूख जाती है। यह बासमती औषधीय गुणों से भरपूर है।
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कम होता है उत्पादन : रणजीत सिंह
किसान रणजीत सिंह ने बताया कि लायलपुरी बासमती की पैदावार अन्य धान से कम होती है। जहां अन्य धान 45 किलो होंगे वहीं इसकी पैदावार सिर्फ 15 किलोग्राम ही होती है। कम पैदावार के चलते किसानों को इसमें बहुत कम लाभ मिल रहा है। इसलिए किसानों ने इसकी खेती कम कर दी है।
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पानी पूरा नहीं हो पाता : अश्वनी कटोच
किसान अश्वनी कटोच ने बताया कि धान की इस खेती के लिए पानी की अत्यधिक जरूरत रहती है। इसके पौधों को हर समय पानी चाहिए। लेकिन अब बारिश कम होने और समय पर न होने के कारण यह फसल सही ढंग से नहीं हो पाती और किसानों को हानि हो रही है।
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दवाइयों का पड़ता है बुरा प्रभाव : दिलावर
किसान दिलावर ने कहा कि विभाग की ओर से इसका बीज पुरानी तकनीक से तैयार किया हुआ ही दिया जाता है जिसके कारण इसकी पनीरी भी सही ढंग से नहीं उग पाती। वहीं इस पर दवाइयों का भी बुरा प्रभाव पड़ता है, जिसके चलते इसके फसल सही नहीं हो पाती।