अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। शहर में चल रहे प्ले स्कूल कारोबार करने में डटे हैं। प्ले स्कूल की एक साल की फीस पीजी या किसी प्रोफेशनल डिग्री से भी ज्यादा है। एचपीयू से आर्ट्स विषय में पूरे दो साल के पीजी कोर्स की फीस 4 से 50 हजार तक होती है। साइंस के विषयों में भी 15 से बीस हजार में पूरा कोर्स हो जाता है। प्ले स्कूल में यही फीस 25 हजार या इससे अधिक ली जाती है।
साल दर साल शहर के हर गली कूचे में प्ले स्कूल दनादन खुलते जा रहे हैं। पहले क्रच खोलने से ट्रायल होता है, कारोबार जैसे जैसे बढ़ता है। दो से तीन कमरों में चल रहे क्रच प्ले स्कूल का रूप ले लेता है। इनमें इसी अनुपात में फीस भी बढ़ती रहती है। पांच सौ से शुरू हुई शुरूआती फीस प्ले स्कूल और प्री नर्सरी बन जाने पर हजारों में चली जाती है। जो कुछ प्ले स्कूलों में 20 से 25 हजार सालाना तक भी पहुंच जाती है। अभिभावक सिर्फ होड़ में बहते हुए इस फीस को बिना किसी सवाल के अदा भी कर देते है।
प्ले स्कूलों का भी शहर के बड़े प्रतिष्ठित स्कूलों के साथ गुप्त गठजोड़ भी होता है। कुछ प्ले स्कूल तो बच्चे की एडमिशन के समय में ही बड़े इंग्लिश स्कूलों में एडमिशन तक के दावे भी कर जाते हैं। इसी चक्कर में अभिभावक इन प्ले स्कूलों में अपने बच्चे को एडमिशन दिलवा कर अपनी कमाई लूटा देते हैं। इन प्ले और प्री-नर्सरी स्कूलों में बहुत से ऐसे हैं जो कहीं पंजीकृत नहीं।
इसलिए जाहिर है कि सरकार, प्रशासन और शिक्षा विभाग का इन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। इसी का लाभ उठाकर इन प्ले स्कूलों में भी जमकर अभिभावकों पर इमोशनल अत्याचार बराबर होता है। शहर में खुले कुछ प्ले स्कूल ऐसे है, जो राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ब्रांडेड प्ले स्कूल की शाखा के रूप में चलते है।
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दो हजार प्रतिमाह से सालाना 25 हजार तक फीस
प्ले स्कूलों में अपना ब्रांड चमकाने और प्रचार के लिए अभिभावकों की ही जेब ढीली की जाती है। बच्चा अभी सही ढंग से बोल भी नहीं पाता है। मगर उसे ट्रैक सूट, अलग वर्दी, हर तीसरे दिन कोई न कोई डे फिक्स गतिविधियों के आयोजन के नाम पर भी अलग से पैसा वसूला जाता है। इन प्ले स्कूलों में सुविधाओं के नाम पर मनमर्जी की फीस वसूलने का काम भी जमकर होता है। इन स्कूलों में प्रतिमाह तीन हजार तो सालाना बीस से 25 हजार रुपये तक की फीस वसूली जाती है।
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बच्चे को सिखाया जाता है उठना-बैठना
प्ले स्कूलों में आम तौर पर स्कूल से पहले बच्चे को पढ़ाई के लिए तैयार किया जाता है। इसमें झूले आदि में खेलने, ड्राइंग, रंग भरना आदि सिखा कर बच्चे के दिमाग को विकसित करने का प्रयास किया जाता है, वहीं उसे उठना बैठना, खाना पीना सिखाया जाता है। इसमें कुछ स्कूल लिखना भी सिखाते हैं।