शिमला। हिमाचल प्रदेश में सीमेंट की दो कंपनियां नियमों को तार-तार करती रहीं और सूबे के सरकारी मुलाजिम सोते रहे। किसी अफसर ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई, जो मौके पर पहुंचकर कानून तोड़ने वाली कंपनियों के खिलाफ कोई प्रशासनिक कदम उठा सके। प्रदेश सरकार ने भी आंखें बंद कर लीं। नोटिस और कार्रवाई की बात तब शुरू हुई, जब सरकार और कंपनियों के बीच सीमेंट की दरों को लेकर विवाद खड़ा हुआ। कंपनियों ने सीमेंट की दरें घटाने से मना कर दिया। इसको लेकर हिमाचल प्रदेश की सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा हो रहा है। इस मामले में कई अफसर नप सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक पिछले एक साल से जेपी सीमेंट कंपनी अपने प्लांट में क्षमता से अधिक सीमेंट का उत्पादन कर रही है। पहाड़ का सीना चीरकर स्वीकृति से अधिक खनन कार्य किया जा रहा है। करोड़ों रुपये राजस्व की क्षति पहुंचाई गई। विद्युत बोर्ड की ओर से स्वीकृत प्लांट से अधिक की बिजली मुहैया कराई गई। अंबुजा ने बिना किसी अनुमति के कोल पिट लगा लिया। इस पूरे खेल में नीचे से लेकर ऊपर तक का सरकारी सिस्टम शामिल रहा। किसी ने इस कंपनी के खिलाफ आवाज उठाने या किसी प्रकार की कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाई। अब जब कंपनियों ने सीमेेंट के मनमाने रेट को लेकर सरकार को अनसुना करना शुरू कर दिया तो अब नागवार गुजर रहा है। हायतौबा मची है। रातोंरात नोटिस जारी करने से लेकर आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने तक की बात की जा रही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिन मुलाजिमों ने अब तक आंखें बंद रखीं, उनके खिलाफ सरकार क्या कार्रवाई करेगी। उद्योग महकमे से लेकर ऊर्जा महकमा तक इतने समय तक मूकदर्शक क्यों बना रहा। इस संबंध में सरकार का पक्ष लेने के लिए सूबे के उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री के मोबाइल कई बार पर फोन किया गया, लेकिन उन्होंने उठाया नहीं। उन्हें मैसेज भी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
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अफसरशाही ने भी साधी चुप्पी
सीमेंट कंपनियों के मामले में अफसरशाही ने भी चुप्पी साधी ली है। उद्योग, ऊर्जा और पर्यावरण महकमे से जुड़े अफसर इस मामले में किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करने को तैयार नहीं हैं। अभी तक नेताओं के इशारों के बिना आज तक सीमेंट या किसी भी उद्योग के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती थी।