शिमला। हिमाचल में दोबारा बहाल किए जा रहे प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की राह में खुलने से पहले ही रोड़े अटक रहे हैं। एक ओर भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने ट्रिब्यूनल के नियमों को अब तक मंजूरी नहीं दी है, वहीं दूसरी ओर केंद्र में सरकार बदलने के बाद पूर्व भाजपा सरकार में प्रभारी रहे कर्मचारी नेताओं ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन कर्मचारी नेताओं की एक अहम बैठक दो दिन पहले सोलन में हुई। इसमें तय किया गया कि राज्य के चारों सांसदों के मार्फत भारत सरकार से मसला उठाया जाए और एक ज्ञापन सौंपकर ट्रिब्यूनल की बहाली का विरोध किया जाए।
इस बैठक में कर्मचारी परिसंघ के अध्यक्ष विनोद कुमार, अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र ठाकुर और प्रेम सिंह भरमौरिया, कामगार कल्याण बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष घनश्याम शर्मा, हेमराज शर्मा, गोपाल जिल्टा, वेद शर्मा आदि कई कर्मचारी प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें ये भी हुआ कि सभी मिलकर एक संयुक्त ज्ञापन बनाएंगे और इसे भारत सरकार से उठाया जाएगा। कर्मचारी नेताओं ने तर्क दिए हैं कि हिमाचल सरकार ने परिसंघ के उन सवालों का संतोषजनक जवाब अब तक केंद्रीय कार्मिक विभाग को नहीं दिया है। सरकार ने कहा है कि वह अपने चुनाव घोषणा पत्र के वादे के कारण ट्रिब्यूनल को खोल रही है। लेकिन यदि इससे कर्मचारियों को नुकसान हो रहा है तो घोषणा पत्र को थोपना सही नहीं है।
पूर्व भाजपा सरकार ने 2008 में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को निरस्त कर दिया था। इससे बाद सरकारी कर्मचारियों से जुड़े केस हाईकोर्ट शिफ्ट हो गए। अब सरकार दोबारा इसे खोलना चाहती है। इसके बाद हाईकोर्ट से सभी सर्विस मैटर भी वापस ट्रिब्यूनल में आ जाएंगे। कैबिनेट में हुई फैसले के अनुसार इसमें एक चेयरमैन और तीन सदस्य होंगे। भारत सरकार से सरकार ने मंजूरी ले ली थी, लेकिन इसके रूल्स अब भी क्लीयर नहीं हुए हैं।