शिमला। मई 2012 में नगर निगम चुनाव में मेयर और डिप्टी मेयर का पद कब्जाने वाली मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी का जनाधार भी इन चुनावों में प्रभावित हुआ है। दो साल पहले मेयर, डिप्टी मेयर पद पर 21-21 हजार वोट लेकर पूरे देश में डंका बजाने वाली माकपा लोकसभा चुनाव में शिमला शहर में 1473 मतों में सिमट गई है। दिसंबर 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी टिकेंद्र पंवर को 7973 वोट मिले थे। सात माह के भीतर हुए इस चुनाव ने माकपा की खिसकती जमीन का अंदेशा जता दिया था। मतदाताओं में पार्टी का जनाधार गिरने का बड़ा कारण माकपा का नगर निगम में नाकाम साबित होना माना जा रहा है। खामियाजा पार्टी प्रत्याशी जगतराम को भुगतना पड़ा है।
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दो साल में टूट गए सारे मिथक
नगर निगम में पहुंचेंगे, इस बात का अंदाजा दो साल पहले खुद माकपा प्रत्याशियों को भी नहीं था। दोनों प्रत्याशी जीत को लेकर आश्वस्त होने के साथ-साथ आशंकित भी थे। जहां एक ओर कांग्रेस से उनका कड़ा मुकाबला था। दूसरी ओर सीधे सरकार से टक्कर थी लेकिन, जनता ने सभी मिथक तोड़कर संजय और टिकेंद्र को गले लगाया। आम आदमी तक दी गई दस्तक सिर चढ़ कर बोली। सादगी से लड़े गए चुनाव के बावजूद दोनों सीटें हजारों के मार्जन से जीत कर लाए। इस लोकसभा चुनाव में माकपा के प्रदर्शन ने इनकी पोल खोल कर रख दी है।
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बडे़ चुनाव ने किया मताें का ध्रुवीकरण : सिंघा
पूर्व विधायक और माकपा के प्रदेश सचिव राकेश सिंघा का कहना है कि बड़े चुनावों में मतों का ध्रुवीकरण होता है। मतदाता तीसरे विकल्प के बजाए दो ही पार्टियों के बारे में सोचते हैं। नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा चुनाव में फर्क होता है। हर चुनाव में मुद्दे अलग होते हैं। शिमला शहर में पार्टी का कोर सुरक्षित रखने में हम सफल साबित हुए हैं। भविष्य में संगठन को और मजबूत किया जाएगा।