शिमला। लोकसभा चुनाव की जंग ने हिमाचल में कारगिल युद्ध के हीरो बांट दिए हैं। जुलाई 1999 में कारगिल की चोटियों पर लड़ी गई इस लड़ाई में देश के लिए साथ जीने-मरने वाले योद्धा राजनीतिक मजबूरियों और इच्छाओं के कारण अलग रास्तों पर हैं। नगवाईं के खुशहाल सिंह और पालमपुर के विक्रम बत्तरा आपरेशन विजय में साथ थे। इसी लड़ाई में दिखाए शौर्य ने एक को ब्रिगेडियर बनाया तो दूसरे को पहले कैप्टन का रैंक और शहादत के बाद परमवीर चक्र दिलाया।
बत्तरा की शहादत को सलाम करने वाले ब्रिगेडियर खुशहाल 2010 में रिटायर हुए और उनके परिवार के संपर्क में भी रहे। लेकिन आज ब्रिगेडियर भाजपा के साथ हैं तो शहीद बत्तरा की मां कमलकांता बत्तरा हमीरपुर से आम आदमी पार्टी प्रत्याशी। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, लेकिन जहां राजनीति की बात आती है, तो कोई टिप्पणी को तैयार नहीं। बिग्रेडियर खुशहाल कहते हैं, आज देश की स्थिति ये है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। इसलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी को चुना। कारगिल युद्ध के दौरान जब नरेंद्र मोदी, प्रेम कुमार धूमल और गुलाब सिंह ठाकुर मोर्चे पर आए थे, तो पहली बार इनसे संपर्क हुआ। बाद में भी ये रिश्ता कायम रहा। जहां तक बतरा परिवार की बात है, तो वह उनका सम्मान करते हैं, लेकिन राजनीतिक रास्ता उन्होंने खुद वैसे ही चुना, जैसे कि मैंने।
हमीरपुर से आप प्रत्याशी कमलकांता बत्तरा कहती हैं कि उनके बेटे ने देश के लिए अपना योगदान दिया। अब उनकी बारी है। वह व्यवस्था में सुधार के लिए चुनाव में उतरी हैं। भ्रष्टाचार रहित राजनीति उनका लक्ष्य है। इसके लिए जरूरी नहीं कि सभी एक ही रास्ता चुनें।
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2.80 लाख पूर्व सैनिक परिवार बड़ा वोट बैंक
हिमाचल में सैनिक-पूर्व सैनिक परिवार करीब 2.80 लाख हैं। यहां 1.25 लाख पूर्व सैनिक तो 1.15 लाख वर्तमान सैनिक हैं। करीब 30 हजार विधवाएं एवं युद्ध विधवाएं हैं। हर घर में 4 या 5 सदस्य माने जाएं तो करीब 12 लाख का वोट बैंक बनता है। इस आंकड़े को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता, इसलिए राजनीतिक दल पूर्व सैनिक अफसरों को हाथोंहाथ ले लेेते हैं। कांग्रेस और भाजपा में पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ बने हैं। एक्स सर्विसमैन लीग को मेजर विजय मनकोटिया संभाले हुए हैं।