पैथोलॉजिस्ट से कैसे बनी देव्यागिरी महंत
जब देव्यागिरी ने घर छोड़ा तो वह मात्र 22 साल की थीं। इतनी कम उम्र में देव्यागिरी ने संन्यास ले लिया। उस समय देव्यागिरी को संन्यास क्या होता है, यह भी ठीक से मालूम नहीं था। साल 2002 में 10 जनवरी को देव्यागिरी ने संन्यास के लिए पहली बार दीक्षा ली। फिर दो साल बाद साल 2004 में जब कुंभ का आयोजन हुआ तो देव्यागिरी ने पूर्ण संन्यास ले लिया। उनके लिए ये सब कर पाना आसान नहीं था। सबसे पहले तो देव्यागिरी ने महंत केशव गिरी को अपना गुरु बनाया लेकिन उन्होंने देव्यागिरी को स्वीकार नहीं किया। हालांकि बाद में देव्यागिरी की आस्था व भोलेनाथ के प्रति विश्वास को देखकर मान गए। 9 सितंबर साल 2008 में देव्यागिरी को मनकामेश्वर मंदिर का महंत बना दिया गया। देव्यागिरी जब महंत बनी तो साधु संतो के ताने सुनने पड़े। लोग एक महिला को महंत के तौर पर नहीं देखना चाहते थे। देव्यागिरी ने सबकुछ धैर्यपूर्वक सुना लेकिन अपने मार्ग पर अडिग रहीं और आज तीन सालों बाद उनको वह सम्मान मिल रहा है जो किसी भी महंत को मिलता है।