देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की रहने वाली ममता उनियाल एक प्रशिक्षित नर्स थीं और उनके पति विकास उनियाल पत्रकार। दोनों का जीवन सामान्य रूप से चल रहा था, लेकिन सब कुछ तब बदल गया, जब ममता की सास भावना अचानक बीमार रहने लगीं। जांच में पता चला कि उन्हें कैंसर है और रिपोर्ट में इसका कारण बताया गया- ‘
हेवी स्मोकर।’
रासायनिक अगरबत्तियों के धुएं से कैंसर
लेकिन यह चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि उनकी सास ने कभी किसी नशे का सेवन नहीं किया था। सच्चाई जानने के लिए दोबारा जांच करवाई गई और फिर वही नतीजा आया। डॉक्टर से लंबी बातचीत के बाद एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि बेशक उनकी सास भावना किसी नशे का सेवन नहीं करती थीं, लेकिन वह सालों से घर में जल रही हानिकारक रासायनिक अगरबत्तियों का धुआं अपने भीतर ले रही थीं।
ममता और उनके पति विकास इस सच को स्वीकार कर ही रहे थे कि उनका ध्यान मंदिर में चढ़ाए गए फूलों पर गया। दोनों ने महसूस किया कि देवभूमि उत्तराखंड अपने आध्यात्मिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यहां के मंदिरों में हर दिन श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति के साथ फूलों का अर्पण करते हैं। इन फूलों की महत्ता भले ही धार्मिक रूप से गहरी हो, लेकिन पूजा के बाद यही फूल अक्सर कूड़े में फेंक दिए जाते हैं। भक्तों की इसी श्रद्धा को कूड़ा बनता देख दोनों के मन में विचार आया कि क्यों न इन फूलों से प्राकृतिक अगरबत्तियां बनाई जाएं?
फूलों से अगरबत्ती बनाने की शुरुआत
बस, फिर क्या था! ममता ने मंदिर-मंदिर घूम कर फूलों को इकट्टा करना शुरू किया तो वहीं विकास ने अगरबत्ती बनाने के लिए प्रशिक्षण लिया।
ममता बताती हैं, “
शुरुआत में हम दोनों ने ही स्थानीय मंदिरों से संपर्क कर फूल इकट्ठा करने शुरू किए। फिर इन फूलों को छांटकर, साफ करके और प्राकृतिक सुगंधों के साथ मिलाकर ऑर्गेनिक अगरबत्तियां तैयार कीं। ये न केवल पर्यावरण के अनुकूल थीं, बल्कि इनसे निकलने वाली सुगंध भी मानसिक शांति प्रदान कर रही थी। विकास ने फूलों से अगरबत्ती के अलावा धूप स्टिक और अन्य उत्पाद बनाने की शुरुआत भी की। विकास ने देहरादून नगर निगम और उत्तराखंड खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड (केवीआईबी) के सहयोग से 400 से 500 किलो फूलों का प्रतिदिन उपयोग कर 7,000 से 9,000 धूप स्टिक तैयार कीं।”
सास के नाम पर पहल
ममता और विकास ने अपनी इस पहल को नाम दिया- ‘
भावना’, जो कि उनकी मां के नाम से प्रेरित है।
ममता कहती हैं,
“इस यात्रा में मुझे उत्तराखंड के हर कोने से फूल मिले। इन फूलों को इकट्ठा कर हमने उनका सही तरीके से पुनः उपयोग किया, ताकि हमारी मां की तरह किसी अन्य को हानिकारक अगरबत्ती के धुएं से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का सामना न करना पड़े। साथ ही उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं, में इस एक पहल ने महिलाओं को घर के पास ही स्थायी काम देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का एक मजबूत मंच भी दिया। इससे धार्मिक स्थलों से निकलने वाले कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने का अवसर भी मिला है।”
वह आगे बताती हैं, “
जब मैं देखती हूं कि इन फूलों से बनी अगरबत्तियां घरों में जल रही हैं तो गर्व होता है कि यह काम केवल फूलों का दोबारा उपयोग नहीं, बल्कि परंपरा और प्रकृति के बीच एक सुंदर पुल बना रहा है।”
विकास कहते हैं, “
ये अगरबत्तियां न सिर्फ वातावरण को सुगंधित कर रही हैं, बल्कि सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी में रोशनी और उम्मीद की महक भी बिखेर रही हैं।”