पद्मश्री पुरस्कार पाकर बीरूबाला रभा का मनोबल काफी ऊंचा है। वो बेहद उत्साहित हैं और इस पुरस्कार को उन लोगों को समर्पित करती हैं जो इस अभियान में उनका साथ देते हैं। असम की रहने वाली बीरूबाला रभा के पिता की मृत्यु मात्र 6 साल की उम्र में हो गई। जिसके बाद बीरूबाला को पढ़ाई छोड़ मां के साथ खेतों में काम करना पड़ा। 15 साल की उम्र में एक किसान से शादी के बाद वो तीन बच्चों की जिम्मेदारी कपड़ा बुनकर उठाती थीं। 1980 में जब उनके बड़े बेटे को टायफाइड हुआ तो वो इलाज के लिए गांव के नीम-हकीम के पास गईं। जहां पर बताया गया कि उनका बेटा मर जाएगा। लेकिन बच्चे की जान बच गई। तब से बीरूबाला ने नीम हकीम और जादू टोना करने वालों के विरोध में अभियान चलाने की शुरुआत की।
बीरूबाला ने जब ये देखा कि गांवों में महिलाओं को डायन बताकर उनकी हत्या कर दी जाती है, तो उन्होंने महिलाओं का एक समूह बनाया और डायन के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की। वे स्कूलों में जाकर बच्चों को डायन प्रथा और जादू टोने से दूर रहने के प्रति जागरूक करती हैं। बीरूबाला अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान बचा चुकी हैं। उनकी कोशिशों के चलते असम की विधानसभा ने "डायन हत्या निषेध" विधेयक पारित किया है।