बिहार के मधुबन जिले के रांटी गांव की दुलारी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। विद्यालयी शिक्षा से वंचित दुलारी देवी कभी झाड़ू पोछा कर जीवन यापन करती थीं। लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय एपीजे अब्दुल कलाम को प्रशंसक बना लिया था। गरीब परिवार में जन्मी दुलारी देवी घरों में काम करने के दौरान प्रख्यात मधुबनी पेंटिंग कलाकार कपूरी देवी के संपर्क में आईं। जहां से उनका इस कला के साथ सफर शुरू हुआ।
दुलारी देवी ने अबतकर सात हजार पेंटिंग विविध विषयों पर बनाई है। 2012-13 में उन्हें राज्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। गीता वुल्फ की पुस्तक 'फॉलोइंग माइ पेंट ब्रश' और मार्टिन लि कॉज की फ्रेंच में लिखी पुस्तक मिथिला में दुलारी की जीवन गाथा व कलाकृतियां सुसज्जित है। सतरंगी नामक पुस्तक में भी इनकी पेंटिग ने जगह पाई है। इग्नू के लिए मैथिली में तैयार किए गए आधार पाठ्यक्रम के मुखपृष्ठ के लिए भी इनकी पेंटिग चुनी गई। पटना में बिहार संग्रहालय के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुलारी देवी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। वहां कमला नदी की पूजा पर इनकी बनाई एक पेंटिग को जगह दी गई है।
वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले की भूरी देवी को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया गया है। भारत के सबसे बड़े आदिवासी भील समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। उन्हें मध्य प्रदेश के द्वारा राज्य के सर्वोच्च शिखर सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। भील कलाकार के तौर पर वो चित्रकारी के लिए कागज और कैनवास का इस्तेमाल करने वाली पहली चित्रकार हैं। भूरी बाई अब भोपाल में आदिवासी लोककला अकादमी में एक कलाकार के तौर पर काम करती हैं। उन्हें मध्यप्रदेश सरकार से सर्वोच्च पुरस्कार शिखर सम्मान (1986-87) प्राप्त हो चुका है। 1998 में मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें अहिल्या सम्मान से विभूषित किया।
झारखंड की छुटनी देवी की कहानी इन सबसे अलग काफी मार्मिक है। कभी डायन कह उन्हें घर-गांव से निकाल दिया गया था। आज 62 साल की छुटनी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। पति और गांव को छोड़ छुटनी अपने चार बच्चों के साथ जंगलों में रहने को मजबूर हो गई थीं। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। झारखंड के आसपास के गांवों में महिलाओं को डायन कह उनके साथ दुर्व्यवहार करने की परंपरा सालों पुरानी है। ऐसे में छुटनी देवी ने अपने जैसी प्रताड़ित महिलाओं को इस कलंक के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया। आज वो गांव में एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के सौजन्य से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती हैं।